दो हजार सत्रह

अनुक्रमणिका

१.दुनिया इन दिनों २.मूर्खा ३.वसुधैव अ-कुटुम्बकम् ४.अभिशप्त खिड़कियाँ ५.आखिर में वही ६.महत्वपूर्ण

७. ८. ९. १०.




दुनिया इन दिनों


मैंने अपने घर के आगे
बनवा दी एक बड़ी-सी दीवार
दरवाजे दो
एक मुख्य,एक जाली का
खिड़कियों में भी लगवाई लोहे की सलाखें,
कांच और जाली के दरवाजे.

फिर सब जगह खींच दिए पड़दे
और कर लिया अपने आपको सब ओर से बंद बंद.

अब पूछती फिरती हूँ सबसे
आजकल चिड़ियाँ नहीं दिखती
कबूतर भी नहीं आते इन दिनों
कौव्वों की कांव कांव
और गाय का रम्भाना भी नहीं सुना बहुत दिनों से
पड़ौस के बच्चे ने भी
मचलना छोड़ दिया है शायद.

पता नहीं दुनिया को क्या हो गया है
इन दिनों.

------------------------१६ मई 

मूर्खा 

उन्होंने कहा
सीढ़ियाँ चढ़ना - उतरना 
अच्छा होता है
मेरे चेहरे की परेशानी भाँप  ली उन्होंने
और बड़े मनुहार से,
मंद मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा
चढ़ने की चिंता मत करो
वह हम देख लेंगे
तुम उतरो धीरे-धीरे,आराम से

मैं समझ ही नहीं पायी 
उनके मंतव्य को 
इतना चढ़कर भी वे थके नहीं
मुस्कान कायम रही वैसी ही
और गहरा गयी 

आराम से उतरकर भी
मैं थकी थकी-सी 
क्लांत क्योंकर, 
यह जान ही नहीं पायी 
कि उतरते - उतरते मैं निचले पायदान पर आ गई
और वे पहुँच गये शिखर पर ।
------------------------------ १६ मई 

वसुधैव अ-कुटुम्बकम्   

नया परिवार 
अपने साथ ले आता है 
पानी की बोतलें 
दूध की थैलियाँ 
होटल से बँधवाया खाना 

मूवर्स एन पैकर्स के बन्दे 
जमा देते हैं सामान,यथास्थान 

किराना और अख़बार की व्यवस्था 
हो जाती है ऑनलाइन 
काम करनेवाली बाइयाँ 
खुद ही कर लेती है अपनी मार्केटिंग 

नए आनेवाले को 
जरुरत नहीं होती पड़ौसी की 
पुराने भी नहीं करते 
उसकी उपस्थिति को दर्ज

किसी को नहीं है 
दो गज जमीं की परवाह
कोई नहीं बिखेरता डेढ़ इंच की मुस्कान 

सब समाये हुए दिखते हैं वसुधा में 
बिना किसी कुटुंब के ।
-------------------- ३ जुलाई

अभिशप्त खिड़कियाँ


पीछे वालों ने कहा 

खिड़कियाँ खोल दो 

सूरज की रोशनी से 

भर जाएगा कमरा 

ठण्डी हवा आयेगी छन-छनकर 


आगे वाले बोले 

बन्द कर दो 

इतनी रोशनी से 

नीन्द खुल जाती है 

आँखें चुंधियाती है 

अन्दर की ठण्डी हवा गर्म हो जाती है 


अभिशप्त खिड़कियाँ 

झूलती रही 

कभी बन्द हुई 

कभी खुलती रही।

--------------------- १९ जुलाई

आखिर में वही 


आखिर के कुछ दिनों में 

माँ अक्सर खोलकर बैठ जाती थी 

अपनी संदूक 

और चुपके-से छिपाकर देखती थी 

पिता की तस्वीर 


किसी की आहट पाते ही 

जताती थी अपनी व्यस्तता 

और अपने सिर्फ दो-चार लुगड़ों पर 

आहिस्ता आहिस्ता हाथ फेरती 

करने लगती उन्हें उल्टा-पुल्टा 


हम कहते थे 

माँ ! अब ये पुराने लुगड़े 

कब तक पहनोगी 

ले आते हैं कुछेक नये 

रोक देती थी वह साग्रह 

और जल्दी से कहती थी 

नहीं मुझे अभी जरूरत नहीं है 

फिर बुदबुदाती थी 

अब दिन ही कितने बचे हैं 


कुछ दिनों से मेरा भी मन होता है 

अलमारी में रखी पचासों साड़ियों को 

यूँही ऊपर नीचे करने का। 

------------------- २४ अगस्त


महत्वपूर्ण

ऐ औरत ! 
तुझे कुचला जाना सबसे महत्वपूर्ण है ।

तुझे क्षत विक्षत करेंगे 
या डंडे से पीटेंगे
तेरी गर्दन को नीचा रखना 
सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ।

तू कर ले कितनी भी कोशिश
गार्गी, मैत्रेयी बनने की 
तुझे जबाला बनाना 
सर्वाधिक महत्वपूर्ण है ।

 देंगे तुझे आसंदी का सम्मान
 पर  समय आने पर भी
 बनी रहे तू गूंगी 
 ये साधना बहुत ही महत्वपूर्ण है ।
--------------------------- २३ सितम्बर

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