अनुक्रमणिका
१.तुम ऐसे नहीं थे ! २.कविता की भी उम्र होती है ! ३.जीवंतता ४.वे सब ५. ६. ७. ८. ९. १०.
तुम ऐसे नहीं थे !
तुम शुरू से ऐसे नहीं थे
याद है ? छुप जाते थे
माँ के आँचल में
लड़ते थे स्नेह करते थे बहनों से
पड़ोस में, विद्यालय में
एकाध सहेली भी हुआ करती थी तुम्हारी
बाद में जाने-अनजाने
सिखाया गया तुम्हें व्याकरण
तुम्हारे व्याकरण की शुरूआत
सर्वनाम और क्रिया से हुई
तुम पारंगत हो गए
और व्यक्त होने लगे
मैं कहूंगा तो….
मैं बोलूंगा तो….
मैं चाहूंगा तो….
फिर धीरे से
विशेषण भी आ गये तुम्हारे भीतर
और वाक्य लम्बे होने लगे
बहुत बड़े नहीं हुए थे तुम
छोटे ही थे
पर जताने लगे अधिकार
माँ पर, बहन पर, सहेली पर
यह तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा
वहाँ जाना उचित नहीं
मान लो मेरी बात !
इसी में भलाई है
तुम्हारा व्याकरण विस्तार पा रहा था
और तुम आ पहुंचे लिंग पर
पहले शरमाये, सकुचाये
विस्मित हुए, बौखलाये
बाद में उसका अर्थ
समझ में आने लगा
तो तुम आनंदित हुए
हर्षित हुए, रोमांचित हुए
और तुम्हारी यह यात्रा
विकृति पर आकर रुक गई
अब लिंग के अलावा
तुम्हें कुछ नहीं दिखता
कुछ नहीं सुहाता
इस व्याकरण से बाहर आओ !
आनंद, हर्ष और रोमांच के लिए
और भी बहुत कुछ है दुनिया में
तुम्हारा वही पुराना प्रेम
पुराना स्नेह पाने को व्याकुल है
तुम्हारी माँ तुम्हारी बहनें
और हाँ तुम्हारी सखियाँ भी।
-------------------- ३ जनवरीकविता की भी उम्र होती है !
प्रतिदिन नहा धोकर
पढ़ने बैठ जाती है
हाथ में लेकर
कोई धार्मिक ग्रन्थ
कहती है
जब तक
आँखें साथ दें
तब तक ही पढ़ लूँ
बाकी कुछ करने की शक्ति तो अब बची नहीं
इस उम्र में कम से कम धर्म को तो जानूँ
सोचती हूँ
कि उनकी अवस्था तक पहुँचने के बाद
मैं पढूँगी एक बार फिर
अपने प्रिय कवियों को
और उन्हें भी
जो अभी नहीं आ रहे हैं पसंद
जानना चाहूँगी
समझना चाहूँगी
नए कवियों को
एक ही बैठक में
पढ़ लेना चाहूँगी
पुरातत्ववेत्ता या जुगलबंदी
जैसी लंबी कविताओं को
बधाई देना चाहूँगी
उन कवयित्रियों को
जिन्होंने हिम्मत से लिखा
स्त्री और स्त्रीत्व के बारे में
क्या यह सब मेरे अंतिम दिनों में
समझे जाएँगे
मेरी आस्था के प्रतीक
या यह समझा जायेगा
कि जिंदगीभर भागती रही
कविता के पीछे
अब क्यों नहीं पढ़ती
गीता या रामचरितमानस
कुछ नहीं तो
पढ़ ले अपनी भाषा में
ज्ञानेश्वरी,दासबोध
आखिर में
कोई आकर दे सकता है
यह समझाइश भी
कि सुनो ! हर उम्र के
अपने कुछ नियम होते हैं
कविता की भी एक उम्र होती है।
-------------------- १९ जुलाई
जीवंतता
संघर्ष तो
कचरा भी करता है
बचता फिरता है
झाड़ू की पकड़ से
विरोध करता है
सामूहिक रूप से हकाले जाने का
हवा के हल्के झोंके के सहारे
करता है उड़ने की कोशिश
आकाश की ओर
करता है कभी आतंकित
फैल कर पूरे घर में
उसका संघर्ष देखकर
मन होता है गले लगा लूँ
दे दूँ उसे स्वतंत्रता
कहीं भी विचरण की
मुक्त उड़ने की
तभी जागता है
मेरे अंदर का तानाशाह
जागती है घर के प्रति
स्व की भावना
और मैं उस पर राज करने के लिए
बाँट देती हूं उसे
गीले और सूखे में
निरीह गीला कचरा
उकडूँ हो बैठ जाता है
चुपचाप किसी भी कोने में
सूखे में भी कुछ होता है
जिसे दबाया जा सकता है
पर कुछ विद्रोही कचरा
अज्ञातवास में चला जाता है
अपना पता बदल देता है
मौका पाकर फिर उड़ने लगता है
दबाया गया गीला कचरा
पैदा करता है सड़ांध
फैलाता है बीमारियाँ
और उड़ने वाला कचरा बचाये
रखता है घर की जीवंतता ।
-------------------- १४ अगस्तवे सब
सुबह छ: बजे ही आती है
कपड़ों के धुलाई यंत्र की आवाज
और किसी दूसरे घर से
दोपहर दो बजे
कोई चला देती है मिक्सर
चाय गैस पर चढ़ाने के साथ
तो कहीं नाश्ता बनता है
ग्यारह बजे तक
तैयार हो जाती है
और कोई नहाती है
अलसाई पड़ी दुपहरिया में
कहीं से हर दूसरे - चौथे दिन आती है
व्यंजनों की महक
और कहीं से दिन में
सिर्फ एक बार कुकर की सीटी
और कोई अनगढ़
कोई तेजतर्रार
कोई ढीली - ढाली सी
कोई करती है बहुतेरे व्रत - उपवास
और कोई कभी भी
नहीं रहती निराहार
अपने घर की, परिवार की
और उनका प्रेम साबुत होता है
उसमें कोई
किन्तु - परन्तु
या / अथवा नहीं होता ।
-------------------- २४ अगस्त
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