१.
जी भर के रोना चाहा
पर हँसी है कि रूकती नहीं !
आदत ऐसी कि छूटती नहीं !!
२.
तुम लिखवाकर लाए थे जमा
और मुझे करना था भुगतान
संतुलन का अद्भुत विधि विधान !!!
३.
अरदास करने का मन है
और तलाश है एक आसन की .....
४.
डिफॉल्टर देश से बाहर
बारिश देश के अंदर
भुगतेगी जनता
किसको है फ़िकर
५.
गर्दन तनी रहे
रीढ़ की हड्डी बनी रहे
कोशिश रही जिंदगी भर
टूट गई कमर !!!
६.
चाहो तो हाशिए पर डाल दो
पर भीड़ के साथ चलना मंजूर नहीं .....!!!
७.
प्रभु ! अगले जन्म रेल चालक बनाना
गाड़ी तेज दौड़े न दौड़े
कम से कम पटरी पर तो चलेगी ....
८.
खून उबलता है अब भी
बदल नहीं पाया समय के साथ !!
९.
माँ के हाथ में था सदा ही बेलन
उसने थमा दी मुझे कलम
और सृजन की राह पर एक साथ हम !!!
१०.
मोह घेर रहा था
फाड़कर फेंक दिया
कितना खुला खुला हो गया मन !!!
११.
क्या करोगे हाल मेरा जानकर
अब तो दवा भी बीमार कर देती है मुझे !!
१२.
शिखर पर पहुँचने की चाहत तो है
पर अकेले हो जाना मंजूर नहीं ....
१३.
ईश्वर यदि लिख देता हेंडल विथ केअर
तो दुनिया शायद नर्मी से पेश आती ....
१४.
तपाया , गलाया
फिर भी कैरेट
पूरा चौबीस न हो पाया.......
१५.
तुम्हें आसमान की चाहत थी
मैं नहीं छोड़ना चाहती थी अपनी जमीन
और फिर हम मिल ही नहीं पाये कभी भी .
१६.
तुमने रूलाया
मैं हल्की हो गई
महसूस कर रही हूं
तुम्हारे भारी हो गए मन को ...
१७.
इस मूर्ख तंत्र में अब भी जिंदा हूं ।
इस बात पर मैं बेहद शर्मिंदा हूं ।।
१८.
भूख से भी ज्यादा सताया याद ने
झरने से भी ज्यादा बहाया याद ने
तब भी , अब भी !!!
१९.
मैं धरती तपती रही
मेरी ही मृदा से बने तुम कलश
शीतल ...
२०.
तुम अकबर !
मैं पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर !!
२१.
आईने से कहा
एक बार तो दिखा
और वह चटक गया
२२.
बाद में पढ़ने के लिए
उठाकर रख दी थी कुछ किताबें
धीरे-धीरे खुद को ही पढ़ना मुश्किल हो गया !!!
२३.
उसके जरा-सा गरम होते ही
तुम फट पड़े
छाछ की तरह ।
कितनी खटास भरी थी
तुम्हारे अंदर !!
२४.
मैं लौ थी
जलाई/बुझाई तुमने
फिर भी मैं वैसी ही रही
तुमसे लगी हुई !!!
२५.
ठंड का मनाओ शुक्राना, बरी हो गए
वर्ना तुम थे असली गुनहगार दर्द के !!
२६.
पता ही न चला रात बारिश कब हुई
सुबह-सुबह तकिए ने बताया उसे !!!
२७.
तार पर पड़े कपड़ों की मानिंद मैं
और तुम सूरज, आतुर,
मुझे भीतर तक सोख लेने को !!!
२८.
मैं आज भी अपना बचपन याद कर लेती हूँ !
जब कोई नहीं होता आस-पास
तो गीले हाथ अपने कपड़ों से पौंछ लेती हूँ !!
२९.
वो बोले तुम सीधी हो
मैं जानूँ कि मूरख हूँ
सिधाई और मूर्खता
अंतर बस महीन-सा !!!
३०.
ना कहीं नाद है,ना कहीं संवाद
सिर्फ आवाज़ और आवाज़ !!!
३१.
तुम्हारे होने न होने का
मैं अंदाज ही बांधती रही
तब तक सूरज ढलने लगा था
३२.
एक दूसरे के लिए
अपरिहार्य हो जाना
क्या यही काफी नहीं है
साथ के लिए ?
३३.
कुछ ख़ालिस जीना चाहा था
सलीकों को ये गवारा न था !!!
३४.
कागजों को यूँ फेंका न करो
आत्मा बसती है मेरी,शब्दों में !!!
३५.
मुस्कुराहटों का पता कहीं और पूछ लो !
मेरी गली में दरवाजों के पीछे पढ़े-लिखे लोग रहते हैं !!
३६.
मेरे अंदर का बच्चा अभी भी जिन्दा है
मैं अब भी उठा लेती हूँ आसमाँ सर पर !!!
३७.
खिड़की ! तुम खुशनसीब हो , खुली रह सकती हो
दरवाजे की तरह तुम्हे कोई आते-जाते बंद नहीं करता !!!
३८.
कन्धों को गीला कर यूँ ही चले गए लोग !
मुड़कर किसीने नहीं देखा इन आँखों की नमी को !!
३९.
तुम सॉफ्टवेयर से, अविश्वसनीय ,
मैं सहेजती रही अपने आप को डायरी की तरह !!!
४०.
तुम पीटते रहे मुझे बेताल !
मैं टूटी,पर झंकृत हुई हर बार !!
४१.
आईने को अँधेरे में ही रहने दो
वक्त की लकीरें देखी नहीं जाती !!!
४२.
न तुम
न तुम्हारी बातें
न तुम्हारा तसव्वुर
सिर्फ मैं ,मैं और मैं !!!
४३.
मैंने जोड़ा
तुमने तोड़ा
जुड़े-टूटे दोनों ही !!!
४४.
दिन बीत जाता है , मेहमान - सा
दुःख वहीं रह जाता है , जैसे गृहस्वामी !!!
४५.
रोजे तो कभी रखे नहीं
पर चाँद का इंतज़ार रोज रहता है !!!
४६.
आँखें रोईं हिलक-हिलक कर
कितना सारा अनकहा ,
काजल की तरह फ़ैल गया चेहरे पर !!!
४७.
साथ
सिर्फ एक अहसास
होकर भी नहीं होता
नहीं हो तब भी होता है !!!
४८.
जब सारा निरर्थक
यकायक हो उठता है सार्थक
तब होता है आगमन
वसंत का.
४९.
नहीं समझा सकती
तुम मेरे लिए "क्या" ?
तुम मेरे "कौन" ?
५०.
उफ़ ! ये सन्नाटा ऐसा सुई पटक
कि एक बूँद फिसली तकिये पर
और आवाज सुनाई दी .....
५१.
आँखें मेरी , पलकें मेरी
आंसू जरूर तुमने दिए थे !!!
५२.
सहने की कूवत बढ़ गई है शायद
अब मुझसे कुछ भी लिखा नहीं जाता !!!
५३.
धुंधली होती जा रही है
हाथ की लकीरें
और माथे की गहरी
५४.
सामने आने से अक्सर कतराता है
वह मुझसे नहीं मेरी याद से डरता है !!!
५५.
पानी से भरी बोतल और टिफ़िन
रोज यूँ ही शुरू होता है सफ़र
शाम को लौटते समय दोनों खाली
और साथ में मन-मस्तिष्क की रिक्तता !!!
५६.
जहाँ राह मिली
चल पड़ी
नदी ही तो हूँ
बहती रही !!!
५७.
लड़ते रहे सारी जिंदगी
और सिखा गए
माफ़ कर आगे बढ़ जाना !!!
५८.
वक्त था जो खुद ही कट गया
जिंदगी तो काटने दौड़ती थी !!!
५९.
जलजमाव से कटती जाती है जमीन
औरत कटती है तो होता है जलजमाव
यूँ एक आदिम - सा रिश्ता औरत और जमीन का !!!
६०.
कोई उठाकर ले गया ग़ालिब-नामा
बहुत मुश्किल है अलमारी में बिखरे लफ़्ज़ों को ढूंढना !!!
६१.
नेट पर काम करते हुए बीच-बीच में
फेसबुक पर झांकना
मानो पढाई कर रहे बच्चे का
माँ की आँख बचाकर खेलने भाग जाना !!!
६२.
थाली में चम्मच आया,
दाल-चावल का नाता टूट गया
आलथी-पालथी से
चम्मच अक्सर जुड़ने नहीं देते जमीन से !!
६३.
तुम्हे ढालती रही शब्दों में
और यों रीती होती चली गई !!!
६४.
चलो अच्छा है , दीवारों के कान होते हैं
सुन लेती हैं वो चुपचाप , सन्नाटों की बकबक !!
६५.
भुलाने की राह में रोड़े बहुत थे
आ गया है अब पत्थरों पर चलना !!!
६६.
सीखना चाहती हूँ
उन रास्तों पर चलना
जहाँ सोचना बंद कर सकूं.....
६७.
पाले से बर्बाद हुई
गर्मी में सूख गयी
बारिश हुई गल गयी
स्त्री थी ऐसे ही पल गयी !!
६८.
गर्दन तनी रहे
रीढ़ की हड्डी बनी रहे
कोशिश रही ज़िन्दगी भर
टूट गई कमर !!
६९.
मिलने की मुझे हार्दिक इच्छा है,
सम्भवत: यह मेरा औरतपना है .....
७०.
बिछते गए सामने कालीन
दूरी बढ़ती गई मिटटी से !!!
७१.
तुम मुझ पर
सूरज की तरह सवार
और मैं वंचित
अपनी छाया से भी
७२.
बहुत की मिन्नतें,बहुत मांगी मनौतियाँ
इतना झुकी सज़दे में कि सीधा होना भूल गई..
७३.
मुझे रोकने की कोशिशें नाकाम ही रहेंगी
मैंने चलना कब से छोड़ दिया है ....
७४.
भरा हुआ था खारा कुआँ
पर कोई जमीन खाली नहीं थी
उलीचने के लिए...
७५.
उजाला तो बहुत है
तरस गई हूँ देखने
परछाई तक...
७६.
तुम्हारे आँगन में कल मैंने रोशनी देखी थी
कुछ सितारों को यहाँ भी भेज दो !!!
७७.
दूर तक कभी गयी ही नहीं
कदम उठने से पहले ही खींच लिये गये
पता नहीं कैसे थक गयी !
७८.
जिन्दगी!!! ज़रा बताके तो जा...
तू ऐसी न होती तो कैसी होती....???
७९.
गये वर्ष की कुछ तस्वीरें झूल रही दीवाल पर
सोच रही हूँ बीती बातें,धरे हथेली गाल पर !!!!...
८०.
मौन भाषा है
स्वीकृति या अस्वीकृति ???
८१.
सुई चुभने पर नहीं टपकी
खून की एक भी बूंद
पता नहीं
ये रक्ताल्पता है या
संवेदनाओं का भोथरा हो जाना....
८२.
तुम अनुपस्थित थे
पूरे परिदृश्य में
और तभी मौजूद थे
मेरे भीतर
अपनी सम्पूर्णता के साथ...
८३.
मै सवालों के जवाब किताबों में ढूँढती रही
जिन्दगी एक मक्कार हँसी हँसती रही
८४.
परिचय दिया जाता है
"इतने वसंत देखे"
अक्सर उम्र गुजर जाती है
एक भी वसंत देखे बिना.
८५.
दरवाजा खुला था
कोई नहीं आया
लड़ने के लिए भी मुझे
नाकारा समझा गया
८६.
हाथ लग जाता है
कभी यूँ ही कुछ
और टूट जाते हैं
उम्र भर के सन्नाटे.
८७.
तकलीफ जुड़ने पर ज्यादा होती है
टूटने पर तो रो भी सकते हैं....
८८.
नहीं बनना था धूर्त,शातिर और काइयां ....
लोग मुझे मूर्ख और पगली समझते रहे....
८९.
अंतर्मन में जो घटित होता है
उसका चश्मदीद गवाह कौन होता है..??
९०.
बादलों के बीच आराम से बैठकर , सिर्फ करुणा से मत देखो !
कुछ चांदनी भेजो इधर ,सूरज बहुत तपा रहा है इन दिनों !!
९१.
इस तरह बेतरतीबी से ,संग ना उछालो
पीछे आ रहा है मेरे , एक बड़ा हुजूम !!!!
९२.
कागजों को यूँ फेंका न करो
आत्मा बसती है मेरी,शब्दों में !!!
९३.
मुस्कुराहटों का पता कहीं और पूछ लो !
मेरी गली में
बन्द दरवाजों के पीछे
पढ़े-लिखे लोग रहते हैं !!
९४.
मोह घेर रहा था
फाड़कर फेंक दिया
कितना खुला खुला हो गया मन !!!
९५.
कन्धों को गीला कर यूँ ही चले गए लोग !
मुड़कर किसीने नहीं देखा इन आँखों की नमी को !!
९६.
रात को नींद नहीं आती तो आँख खुली खुली रहती है । बहनापा निभाती सड़क भी जगराता करती मिलती है ।।
९७.
अब जब सब रीत गया , हम अपनी कुछ बात करें ..
वर्णमाला को छोड़ दें ,बस ! अपने मन की बात करें !!!
९८.
दिल एक दिमाग एक ।
बाकी सब अनेक ।।
९९.
आईने से कहा एक बार तो दिखा
और वह चटक गया
१००.
अपने को औरत से माँ बना लिया
अब तुम पर गुस्सा नहीं प्यार आता है ।
१०१ .
मिट जाना चाहती थी शिद्दत से जीती रही !
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