दो हजार तेरह

 अनुक्रमणिका 

१.जुड़ना मिटटी से २.रिक्तता ३.वे लड़कियाँ  गईं कहाँ ? ४.माँ का ब्यूटी पार्लर ५.सलोना चेहरा ६.ताक़ीद मिली थी ७.सन्नाटा ८.आग ९.चुप्पी का नक़ाब १०.पिता की गंध ११.अपने में मगन १२. सलीकेदार औरत १३.पानी तेरे कितने रूप १४.माँ को तो सिर्फ सहना था १५.बेटा ! धीरे 


जुड़ना मिटटी से 

उम्र ने पहली दस्तक दी आँखों पर 
किसी ने कहा अच्छा है
बुद्धिजीवी लग रही हो
सुंदर है, गरिमामय है 
लेखक कम सम्पादक  ज्यादा दिख रही हो
मैंने हँसकर  टाल दिया। 

फिर उसने अपना मोर्चा 
सिर पर  खोला 
धीरे धीरे चांदी बिखर गई 
पूरे कैनवास पर 
जो थोड़े बहुत विद्रोही थे 
नए रंग में रंगना नहीं चाहते थे 
छोड़ गए एक एक कर. 

यकायक एक दिन रीढ़ की हड्डी में कुछ चटका
तनी रहती पीठ ने,कमर ने,गर्दन ने,
सीखा कुछ झुकना 
हाथों ने भी फिर दिन-रात युद्ध करने से 
इंकार कर दिया
यहाँ-वहाँ चलते 
उन्होंने धीरे-धीरे मुद्रा को विराम कर लिया 

अब उम्र जमीन की ओर बढ़ रही है 
उठते-बैठते सहारा ढूँढती है
तेजी से चलने नहीं देती 
भागने के बारे में सोचती भी नहीं है

उम्र शायद अब जमीन तलाश रही है
शायद मिटटी से जुड़ना चाहती है
शायद मिटटी में समाना चाहती है .

----------------------------------६ जनवरी  

रिक्तता 

कल वह  पतीली भरी हुई थी 
मलाईदार दूध से 
आज खाली है 
सिर्फ कुछ खुरचन बाकी है उसमें 
मेरा मन भी ऐसा ही 
हो चला है इन दिनों 
खाली / तिक्त और खुरचनवाला 

सोच रही हूँ कि 
खुरचन में हल्दी मिलाकर 
चेहरा चमकाऊ 
या 
चीनी मिलाकर परोसूं 
गर्मागर्म पराठों के साथ 

विकल्पों की तलाश जारी है 
लेखनी को विराम है 
सर्च इंजन की खातिर 

तमाम खालीपन के बावजूद 
भराव  महसूस कर रही हूँ इन दिनों 
कि ये रिक्तता ही 
ले जा रही है मुझे 
नए रास्तों की ओर. 
-----------------  २० जनवरी 

वे लड़कियाँ  गईं कहाँ ?


हाथों में मुँह  छिपाकर 
इठलाकर हँसनेवाली लड़कियाँ  गईं कहाँ ?

अब लड़कियां खूब जोर से हँसती  है 
गर्दन ऊँची कर, एक दूसरे के हाथ पर 
ताली देकर हँसती हैं 
जो बाहर नहीं आ पाई 
वो थीं क्या खिल-खिलाकर हँसनेवाली लड़कियाँ ?

कि उनकी हँसी  को दबाया गया बहुत दिनों तक 
इसलिए अब उत्सव  मनाती-सी हँसती  हैं लड़कियाँ ?
अब  लड़कियाँ रम जाती हैं कहीं भी
सहज दिखाई देती हैं वे कहीं भी 

किसी की ओर देखकर लजानेवाली  लड़कियाँ गईं कहाँ ?
यूँ ही अपने आँचल को संभालनेवाली  लड़कियाँ गईं कहाँ ?
पैरों से जमीन को कुरेदनेवाली  लड़कियाँ गईं कहाँ ?

कि उनको पूरी ताकत से बताया गया 
 मौसम चाहे कैसा भी हो 
पल्लू लिपटा होना चाहिए पूरी देह पर 
और सिर भी रखना है ढाँपकर  

इसलिए उन्होंने छोड़ दिया 
बात-बेबात लजाना ,
आँचल को उंगली पर लपेटना और 
बार-बार संभालना ?

शाम को मां के साथ रसोई में इधर का बर्तन उधर करती 
लड़कियाँ गईं कहाँ ?
माँ से लड़ियाती, 
माँ की साड़ी पहनकर पूरे घर में इतराती 
लड़कियाँ गईं कहाँ ?
चौराहे पर मोमबत्ती जलाती लडकी का चेहरा 
तुलसी चौरे पर दीपक रखती लडकी-सा मासूम नहीं दिखता 
भोली लडकी जैसी मासूम दिखनेवाली लड़कियाँ गईं कहाँ ?


-------------------- १० मार्च 


माँ का ब्यूटी पार्लर ब्यूटी पार्लर में मुझे मेरी माँ याद आती है पार्लर वाली लड़की जतन से हौले से चलाती है उसके हाथ बालों में मसाज फिर भाप और हेयर पॅक के बाद वह चेहरा लेती है हाथों में आहिस्ता आहिस्ता क्रीम समाने लगती है त्वचा में फिर फेस पॅक और आखिर में आँखों पर रुई के फाहे रखकर कहती है वह मुझसे आराम करने को माँ तो हर हफ्ते करती थी सफाई और साथ-साथ सौंदर्य उपचार भी शिकाकाई, आंवला, रीठा,नागर मोथा, कपूर कचरी और ढेर सारी दूसरी चीजें हाथ से कूटती थी वह गर्म पानी में भिगोकर वह मसाला बालों में लगाकर रखती और फिर मसलने लगती मेरे चेहरे पर लगाया हुआ उबटन हर हफ्ते दही बेसन और तीज त्योहारों पर दूध में भिगोई खसखस का बड़े से स्नान गृह में एक तरफ चूल्हे पर चढ़ा हुआ गरम पानी धुएँ से लाल हो गई आंखें और काम से खुरदुरे हो गए हाथों से माँ सहेजती थी मेरा चेहरा मेरे बाल पार्लर में कुछ अधिक निखर कर आती है खूबसूरती और वह लड़की भी रहती है सजी-धजी पर शाम को बाल औछने के बाद ठुड्डी उठाकर माँ जब मेरा चेहरा देखती थी तो बिना किसी सौंदर्य उपचार के भी वह पार्लर वाली लड़की से सौ गुना खूबसूरत लगती थी । -------------------- १० मार्च


सलोना चेहरा 

मेरे सलोने चेहरे को
और सुन्दर बनाने के लिए
ठुड्डी पकड़कर ,
माँ ने लगा दी थी छोटी-सी बिंदी
तब तुम कहीं आस-पास भी नहीं थे

पिता की उंगली पकड़कर मेले में घूमते हुए
जब मै मचली थी
कांच की रंगीन चूड़ियों के लिए
तुम तब भी कहीं नहीं थे
 
फिर मेरी बिंदी और चूड़ियों का स्वामित्व
तुम्हारे पास कैसे चला गया ?
---------------------------------१६अप्रैल 
ताक़ीद मिली थी

ताक़ीद मिली थी  शोर से बचने की
 उसने  आस-पास सन्नाटे बुन दिए

ग़मों के साये में थीं ख़ुशी की महफिलें
 उसने दुःख के हर्फ़  तोहफे में दे दिए

फूलों की खुशबू से महकता था बागान
उसने  जतन से  वहाँ कांटे बो दिए

 जिंदगी से मिले थे भर भर के उजाले 
 उसने  बदगुमानी में अँधेरे भर दिए

सुना तो था कि अजीब सा शख्स है
मैंने फिर भी सपनों के जाले बुन दिए
--------------------------------९ मई 

सन्नाटा  

महफ़िल में जो छूट गए  सारे बेगाने थे
साथ निकलकर आया मेरा अपना सन्नाटा। 

 बात हुई नहीं , पर  होती तो होती ही रहती
इक दुपहरी - सा बीच में पसर गया  सन्नाटा। 
 
फूलों की पँखुड़िया थीं,हवा में थी खुशबू
नुकीले काँटों जैसा चुभ गया सन्नाटा। 

धीमी कार-आमदी  शायद खोल देती गिरह
बाहर  था कोलाहल, भीतर लेकिन सन्नाटा। 

तेरी पुर - खुलुस याद आकर चली गई
कैसी दहशत फैलाता है बार-बार ये सन्नाटा। 
( *कार-आमदी---सफलता,*पुर - खुलुस --- स्नेहसिक्त) 
-----------------------------------११ मई 

आग  

''घर के भीतर चूल्हे के अन्दर कसमसाती है आग'' यह पंक्ति कथाकार कैलाश वानखेड़े की एक कथा की शुरुआत है , उसी से कुछ पंक्तियाँ मैंने बनाई हैं
 
घर के भीतर चूल्हे के अन्दर कसमसाती है आग
आग को देखकर पेट के भीतर कुलबुलाती है आग
 
हवा करती है पुरज़ोर कोशिश,बहुत फड़फड़ाती है
सूरज से निकलकर  धरती तक चली आती है आग
 
हर शै को कुम्हलाने के लिए छटपटाती है आग
कभी भीतर कभी बाहर ज़लज़ला  लाती है आग
 
पत्थर में चश्में तलाशते हाथों को जलाती है आग
पानी के सोते भी जल गए बुझती नहीं है आग
 
जोग लिखी बदलने को उकसाती रहती है आग
बेबसी हाथों में थमाकर जला डालती है आग 
-------------------------------------------- १२ मई 

चुप्पी का नक़ाब

ज़माने से तो कोई बच सकता  नहीं 
अपने आप से ही अब बचकर चलिए !

रुकने से कौन रोक सकता है किसी को
लड़खड़ाते ही सही मगर उम्रभर  चलिए ! 

तन्हाई है साथ तो फिर अकेले कहाँ 
दर्द का काफ़िला साथ लेकर चलिए ! 

जेवर नहीं बचा है  कोई पहनने के लिए 
आँसुओं  को ही करीने से सजाकर चलिए !

एक लफ्ज़ काफी होता है सहारे के लिए 
भले चुप्पी का नक़ाब ओढ़कर चलिए !
------------------------------------१९ मई

पिता की गंध 

रोज सुबह पिता कहते
चलो ! बगीचे से फूल चुनकर लाते हैं
और मैं उनकी ऊँगली पकड़कर चल देती

वे फिर फूल चुनते जाते
और नाम बताते जाते एक-एक फूल का
उन्हें बागबानी का शौक था
वे कभी पिछवाड़े ले जाते
और सब्जियों के पौधे दिखाते

न फूलों की गंध याद है
न सब्जियों का स्वाद
पर पिता की स्नेहिल ऊँगली
और ऊष्मा से लबरेज  गोद
नहीं भूली हूँ अब तक

शाम को माँ परोसती घर की सब्जी के साथ गरम रोटी
पिता कहते-अन्नदाता सुखी भव
खाने में मीन मेख नहीं
थाली में जूठन नहीं
अन्न का सम्मान
माँ का सम्मान
कितनी बातें बिना बोले सिखा देते थे पिता

दिन में उन्हें कभी यूँ ही खाली बैठे नहीं देखा
रात को लालटेन की लौ में
जाने क्या-क्या पढ़ते रहते थे पिता

पिता मेरे लिए गुलाब का फूल थे
लाल टमाटर थे
अनुशासन का पर्व थे
ज्ञानेश्वरी,दासबोध की किताब थे

ये सारी चीजें बिखरी रहती हैं आसपास
और मैं कोशिश करती हूँ
कि चुरा लूं उन्हीं में कहीं छिपी
पिता की गंध

पिता के जाने के बाद
आसान नहीं है
उनकी गंध को बचाए रखना.
-------------------------------८ जून  

अपने में मगन

पीठ के बल सतर सोना
पिछले दशक की बात है
अब अनजाने में ही करवट देकर
पीठ कर देती है देह को मुक्त

पैर पर पैर चढ़ाकर सोना कहाँ तो
आदत में शुमार था
अब एक पैर दूसरे को
नकार देता है सिरे से

सिर के नीचे रखा अपना ही हाथ
सहारा देता - सा लगता था
अब हटा लेता है वह आहिस्ता से
अपने-आप को
 
जीना चाहते हैं सब अकेले-अकेले
अपने में मगन
कोई नहीं उठाना चाहता अब किसी का भार .
----------------------------८ जून 

सलीकेदार औरत

मुझ पर कोई बंदिश न थी 
मेरे चेहरे पर कोई घूँघट नहीं था
मुझसे कहा गया जीने के लिए साँस जरुरी है,
मैंने साँस ली
मुझसे कहा गया दिन पूरे हो जाते हैं
सभी के एक दिन,
मैंने साँस छोड़ दी
मुझसे कहा गया, खाना चाहिए
मैंने खा लिया
मुझसे कहा गया, नहीं खाना चाहिए
मैंने नहीं खाया

खुलकर हँसना, मुक्त भाव से मिलना-जुलना 
जैसी कुछ चीजें 
मेरी सेहत के लिए अच्छी नहीं थी
मैंने वह सब नहीं किया.

मुझसे कहा गया शिक्षित औरत को 
सलीकेदार होना चाहिए
ज्ञान के दरवाजे से भले गुजर जाये
पर अन्दर झाँकना नहीं चाहिए
मैं आहिस्ता-आहिस्ता गुजर गई
अपने दिमाग का उपयोग सिर्फ 
सर झुकाने के लिए किया
राय शुमारी के लिए नहीं किया
मैंने अपना सलीका नहीं छोड़ा

जब भी मुझसे कहा गया
मैंने कान बंद कर लिए
आँखें बंद कर ली
जुबान को सिल दिया
मन पर सौ ताले जड़ दिए
बुद्धि को ताक पर रख दिया

एक पढी-लिखी औरत हूँ
समझदारी से काम लेती हूँ
मैं  वह सब करती हूँ 
जो मुझसे कहा जाता है
अब मेरे चेहरे से घूँघट हटा दिया गया है
मुझे बँधनों से मुक्त कर दिया गया है

पर तब भी
जब मुझसे कहा जाता है
तभी मैं साँस लेती हूँ
और जब कहा जाता है
साँस छोड़ देती हूँ।
--------------------------- ९ जून 

पानी तेरे कितने रूप 

पानी बजट की तरह आता है
लाभ-हानि का गणित दिखाता है
पानी सुखद होता है पानी दुखद होता है
पानी जीवन-पद्धति बनाता है
जीवन में रंग भरता है, जीवन को बेरंग करता है
आता है,जाता है, उसका सबकुछ तयशुदा होता है
पानी तवज्ज़ो  देता है, आमदवाले लोगों को
टुकड़ों-टुकड़ों में जीनेवालों को यूँ ही गला देता है
पानी मीठा होता है
नमकीन होता है
कभी-कभी पूरी रात
पानी बरसता है तकिये पर
पानी कर देता है तर-बतर 
और सुखा देता है कभी भीतर ही भीतर
पानी अच्छा लगता है
पानी बुरा लगता है।
------------------------------ १५ जून 

माँ को तो सिर्फ सहना था 

अच्छा करो या बुरा करो 
माँ को तो सिर्फ सहना था। 

बारिश तो एक बहाना  था 
यादों को कहीं तो बहना था। 

तुम छोड़-छोड़ जाते रहे 
मुझे तो यहीं रहना था। 

पुराना हो गया तो क्या हुआ 
आखिर वह एक गहना था। 

ये कहाँ से बरबस निकल पड़ा 
मुझे तो कुछ नहीं कहना था। 
------------------------------------११ अगस्त 

बेटा ! धीरे
बेटे ने चलना शुरू किया 
लकड़ी की तीन पहिया गाडी के सहारे 
माँ ने उसी की तरह तुतलाते हुए कहा - बेटा ! धीले

स्कूल  जाते बेटे ने जिद की  सायकल की 
पहिये अभी भी तीन ही थे और माँ भी वही
बेटा ! धीरे कहती हुई 

थोडा बड़ा हुआ बेटा 
दुपहिया सायकल से 
गिरा कई बार , चोटिल हुआ 
माँ ने फिर वैसे ही समझाया - बेटा ! धीरे 

वह छोटा ही था,पर समझने लगा था अपने -आप को बड़ा 
चुपके-से ले जाता था माँ की मोपेड 
और माँ कहती रह जाती -- बेटा ! धीरे

 फिर जरूरत  बढ़ने लगी 
मोपेड अब उसे खुद से भी छोटी लगने लगी 
बाइक पर सवार वह पलक झपकते ओझल हो जाता 
और तेज हॉर्न के शोर में दब जाती माँ की आवाज 
बेटा ! धीरे

अब वह जैसे ही बेटरी और इंजन देखता है 
गाडी की घर-घर से पहले ही माँ का दिल
धड़कने लगता है 
रिमोट की आवाज चौंका देती है माँ को 
 स्टीयरिंग पकडे बेटा , एक आभिजात्य मुस्कान 
आहिस्ता से छोड़ता है माँ की ओर

क्लच गियर की आहट से माँ सिकोड़ लेती है खुद को 
बेटा निकल जाता  है अब बहुत आगे 
सैंकड़ों मील दूर 
पर माँ वहीँ की वहीँ 
सदियों पुरानी
मन ही बुदबुदाती 
बेटा ! धीरे.... धीरे... धीरे 
-----------------------------------१५ अक्टूबर  





 




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