दो हजार उन्नीस

अनुक्रमणिका 

१.अम्मा २.जीवन पुल के नीचे ३.और एक दिन ४.अधबीच ५. ६. ७. ८. ९. १०. 



अम्मा


अब अकेले में ही बड़ी खुश रहती है अम्मा 


अब किसी की बाट नहीं जोहती है अम्मा 

 सुख-दुख किसी से नहीं बाँटती है अम्मा

अपनी ही धुन में मगन चलती रहती है अम्मा


बुक माय शो से फिल्में देख आती है अम्मा 

कभी ठेले से खरीद कर चाट खाती है अम्मा 

अब नज़र नीची करके नहीं चलती है अम्मा 


नये नये कपड़े पहन सजती-सँवरती है अम्मा

ऑनलाइन खरीदारी कर बनी-ठनी रहती है अम्मा

अपने में  खोयी-खोयी मजे- मजे से रहती है अम्मा


बड़े सुकून से चाय पीती जल्दी नहीं उठती है अम्मा

बारह बजे के बाद कभी दुपहरिया नहाती है अम्मा 

अब किसी भी बात की परवाह नहीं करती है अम्मा 


सुबह-सुबह योग ध्यान प्राणायाम करती है अम्मा 

प्राणों को दिन भर यूँ जतन करती फिरती है अम्मा 

जीवन में ही मुक्ति को तलाशती दिखती है अम्मा

-------------------- २४ अक्टूबर

जीवन पुल के नीचे 


पुल बनता है जोड़ने के लिए 

और उसके समीप बनी बस्तियाँ 

दब जाती हैं किनारों से 

वहाँ के लोगों का रिश्ता 

टूट जाता है दुनिया से 

और दुनिया का रिश्ता उनसे 

उनका संसार सिमट जाता है 

पुल के नीचे तक 


पुल के ऊपर से फर्राटे से 

दौड़ती हैं बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ  

कभी कोई चेहरा झाँकता है 

काँच लगी खिड़की से 

और देखता है पुरानी बस्ती को 

हिकारत से 


बस्ती के नये बच्चे 

कभी नहीं समझ पाते 

कि वे क्यों नहीं जा सकते 

पुल से होकर उस पार 


उन्हें कैसे समझाया जाय 

कि पुल सिर्फ सड़क जोड़ता है 

और जीवन

पुल के नीचे बसी बस्ती में होता है। 

-------------------- २३ दिसंबर

और एक दिन


वह गुर्राती रही 

मिमियाती रही 

दूम भी हिलाई उसने 

तलवे चाटे 

रेंगती रही 

फिसलती रही 

हिनहिनाई 

उसके चिंघाड़ने से 

गूँज गया आसमान 


मौका पड़ा तो दहाड़ी 

तेज दौड़ी 

वक्त आने पर 

रंग भी बदला 

सोच नहीं बदलना है 

यह भी सीख लिया 

तब भी वह जी नहीं पायी 

चैन से बैठ नहीं पायी 

कुलांचे भरती रही 

पर कहीं पहुँच नहीं पायी 


और एक दिन विदा हो गयी 

पीछे मुड़कर देख भी नहीं पायी 

-------------------- २३ दिसंबर


अधबीच

मैं  हिन्दू थी 
और तुम धर्मनिरपेक्ष 

मैं करती रही पालन 
परम्पराओं का 
और तुम 
कभी तथागत बन मुस्कुराते रहे
कभी मुझे हलाल कर 
जश्न मनाया 

कभी अखण्ड जलने को 
मजबूर किया 
और कभी देवत्व के नाम 
देखते रहे मुझे सूली पर

अब मैं न हिन्दू रह पाई हूँ 
और न ही चोला पहन पाई हूँ 
तुम्हारी तरह 
धर्म निरपेक्षता का।
----------------------- ३० दिसम्बर

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