अनुक्रमणिका
१.माँ जीवन को स्वीकारने दो ! २.माँ और ईश्वर ३.कोई फर्क नहीं पड़ता ! ४.सच बोलना ५.मैं क्यों नहीं ६.गलित-गात्र ७.वैश्विक मौन ८.लड़की जात हो ९.यूँ ही चली गई बारिश १०.माँ - सी ! ११. विश्वास १२. शर्तें लागू १३.देह का रास्ता १४.सब ठीक है ! १५.कुछ चाहा कुछ कहा १६.समुद्र-से घर १७.अचार की फाँक १८.परिवहन के लोक में
माँ जीवन को स्वीकारने दो !
माँ मुझे बाहर आने दो
अंदर ही अंदर दम घुटकर मुझे मरने मत दो
मैं जानती हूँ मेरे जन्म से
नहीं बढ़ेगी तुम्हारी प्रतिष्ठा
नहीं बढेगा मान-सम्मान
मैं नहीं बन पाऊँगी
तुम्हारे जीवन का आधार
मेरे आने से शायद तुम्हारा
जीवन भी लग जायेगा दांव पर
पर माँ, मुझे बाहर आने दो !
तुम मेरी भी माँ हो, मेरे भाई की तरह
और माँ मैं भी सन्तान हूँ,तुम्हारे बेटे की तरह
माँ तुम समझो कि तुम हो एक व्यक्ति
और मैं भी जन्मूंगी, जियूंगी इन्सान की तरह
पर माँ मुझे बाहर तो आने दो !
माँ तुम्हें ही होना पड़ेगा मेरा कवच,
तुम्हें ही पहनाना होंगे मुझे कुंडल
मुझे रक्त से मत नहलाओ,
पानी में मत बहाओ,
समझाओ पिता को माँ, कुछ कठोर होकर
कि उनकी माँ,उनकी बहन
और स्वयं तुम,उनकी पत्नी
बेटियाँ थी कभी किसी की
समझाओ उन्हें
कि पेट में पल रहा बच्चा , सिर्फ बच्चा है,
उसकी धड़कन सिर्फ धड़कन है,
उसका घूमना सिर्फ घूमना है,
उसकी लातों से पता नहीं चलता
कि वह भाई है या बहना है.
माँ तुम्हें ही लाना होगा मुझे बाहर,
सबसे होकर निडर,
माँ हो सकता है मैं भी बन जाऊँ
कल्पना चावला,किरण बेदी,
इंदिरा नूयी या सुमित्रा महाजन
माँ तुम,तुम और सिर्फ तुम
ला सकती हो मुझे बाहर
एक बार तो बाहर आने दो माँ मुझे
एक बार तो मुझे कुछ करके दिखाने दो
एक बार तो अपने आंचल में जगह दे दो
माँ मृत्यु को नकार रही हूँ मै
मुझे जीवन को स्वीकारने दो !
-------------------------- ३ फरवरी
माँ और ईश्वर
माँ की कोख से गुजरकर धरती पर आई
माँ ने कहा-ईश्वर रचता है हमें
न उसने ईश्वर को देखा
और न मैंने
पर माँ की आस्था को मैंने
मान लिया ईश्वर
और तब से लगातार देख रही हूँ मैं
आसमान की ओर
माँ ने कहा-ईश्वर रचता है हमें
न उसने ईश्वर को देखा
और न मैंने
पर माँ की आस्था को मैंने
मान लिया ईश्वर
और तब से लगातार देख रही हूँ मैं
आसमान की ओर
स्याह रातों के सन्नाटे में
माँ ने कहा-ऊपर देखो
तुम्हें दिखे ना दिखे
रोशनी तो होती ही है वहाँ
माँ का विश्वास रोशनी पर
और मेरा माँ पर
मैंने मान ली फिर एक बार
माँ की बात
माँ ने कहा-ऊपर देखो
तुम्हें दिखे ना दिखे
रोशनी तो होती ही है वहाँ
माँ का विश्वास रोशनी पर
और मेरा माँ पर
मैंने मान ली फिर एक बार
माँ की बात
धीरे-धीरे यह आदत में आ गया
ऊपर देखने का सिलसिला
चलता ही चला गया
ऊपर देखने का सिलसिला
चलता ही चला गया
ईश्वर मुझसे प्रेम करता था
वह चाहता था
मैं उसीकी ओर देखूँ बार-बार
वह बीच-बीच में
मुझे सम्मोहित करता रहा
जादू की छड़ी घुमाता रहा
घुमावदार रास्तों से बाहर लाता रहा
वह चाहता था
मैं उसीकी ओर देखूँ बार-बार
वह बीच-बीच में
मुझे सम्मोहित करता रहा
जादू की छड़ी घुमाता रहा
घुमावदार रास्तों से बाहर लाता रहा
मैं खुश होती रही
सुस्ताती रही
पहले माँ पर और बाद में
ईश्वर पर रीझती रही
उस पर विश्वास किया
निर्भर होती चली गई
सुस्ताती रही
पहले माँ पर और बाद में
ईश्वर पर रीझती रही
उस पर विश्वास किया
निर्भर होती चली गई
फिर एक दिन
माँ को ले गया ईश्वर
अब दोनों एक साथ हैं
और मैं अब भी
देखती रहती हूँ
जमीन से आकाश की ओर.
माँ को ले गया ईश्वर
अब दोनों एक साथ हैं
और मैं अब भी
देखती रहती हूँ
जमीन से आकाश की ओर.
----------------------- २६ फरवरी
कोई फर्क नहीं पड़ता !
एक स्त्री गुजर जाती है
करीब से
कोई फर्क नहीं पड़ता
वह दिनभर दौडती-भागती है
हाँफती है निढाल होती है
कोई फर्क नहीं पड़ता
उसके "होने"को मान लिया जाता है
वह क्या चाहती है
क्या सोचती है
कुछ फर्क नहीं पड़ता
वह रोते-रोते गाती है
गाते-गाते रोती है
पर जुटी रहती है
उसके सुर बेसुरे हो जाय
कुछ फर्क नहीं पड़ता
वह बेलती रहती है रोटी
फूंकती रहती है चूल्हा
भले खुद रहे भूखी
कुछ फर्क नहीं पड़ता
सदेह से विदेह होने तक
वह निरंतर डूबती-उतराती है
लडखडाती है,फडफड़ाती है
किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता
लेकिन जिस दिन उसे देह
और सिर्फ देह समझा जाता है
उस दिन बहुत बड़ा फर्क पड़ जाता है.
--------------------------२६ फरवरी
सच बोलना
सच बोलना सिखाया गया था मुझे भी
पर आपद धर्म के नाम पर
झूठ बोलती रही हूँ मैं.
सामने खड़े आप्त-स्वकीयों को
आत्म रक्षा के लिए ताड़ना दी है मैंने.
मात्र वचन पूर्ती के लिए सिंहासन छोड़ने का साहस
कभी भी नहीं कर पाई हूँ मैं
मेरा मन भी होता रहा है
बुरे रास्तों पर चलने का
ऐसे-वैसे, कैसे भी
खूब धन कमाने का
खूब पहनूँ मैं फूलों के हार
खूब छपे मेरा नाम
सच कहती हूँ
यही चाहा मैंने सर्वदा,हमेशा
लेकिन मेरे मित्रों,मेरे स्वकीयों,
मेरे बुजुर्गों,मेरी संतानों ने
रोक दिए मेरे पाँव
मैं भली औरत तो कभी भी नहीं थी
किन्तु मेरे चारों ओर थे
ये सारे अद्भुत रक्षा कवच
और बचते-बचाते
डूबते-उतराते
आ ही पहुंची हूँ यहाँ तक
एक दीप्त-प्रदीप्त
भद्र महिला का चेहरा लिए।
--------------------------------२४ मार्च
मैं क्यों नहीं
जिंदगी बीत गई इसी प्रपंच में
वो क्यों है वहाँ और मैं क्यों नहीं
ता-उम्र झगड़ने का सिलसिला रहा
वो क्यों जीते बार-बार मैं क्यों नहीं
बंदनवार तो मैंने भी सजाये थे
खुशियों में वो आगे मैं क्यों नहीं
परेशानियाँ थीं इधर भी उधर भी
पा गए निज़ात वो मैं क्यों नहीं
ऐसे ही मासूम सवाल रहे हैं मेरे
मासूम कहलाए वो मैं क्यों नहीं
-------------------- २५ मार्च
गलित-गात्र
उनकी बेढंगी उछलकूद को नृत्य कहूँ
इतनी अज्ञानी नहीं हूँ
उनकी मर्कट-चेष्टाओं पर
अब हँसी भी नहीं आती
आंसू भी सूख गए हैं
पर रुदन जारी है, अब भी
दुःख का आँचल बदल गया हो शायद
पर ताना-बाना उतना ही गहरा, गहराइयों तक उतरा हुआ
उनके पल्लू से लटक-लटक कर
हार गए हैं हम,
थकने लगे हैं,
पर एक बूँद भी नहीं गिरती
किसी के लिए भी.
वे नाच रहे हैं लगातार
बेताल, लास्य हीन
और पसीना चुहचुहाता है
हमारे माथे पर
भूख से आंतें कुलबुलाती हैं
पर रोटी की गंध नथुनों से पार
मस्तिष्क में जा बसी है
कितने ही कीटक , श्वापद
ताक में घूम रहे हैं आस-पास
कुत्ते भौंक रहे हैं
सांप बिल बना रहे हैं
चूहे कुतर रहे हैं
हमारी
सारी की सारी अस्मिता
और हम गहरी निद्रा का
स्वांग रचाए पड़े हुए हैं
गलित-गात्र
नेपथ्य में रहते-रहते अब
ऊब होने लगी है,
झल्लाहट है,
उदासी है,
उबासी है,
भय सताने लगा है
अपनी ही नजर का
वे भले ही नाम देते रहे
उनकी मुद्राओं को
कथक,भरतनाट्यम या मोहिनी अट्टम
या कहते रहे खुद ही
कि वे करते हैं तमाशा या नौटंकी
और जुड़े हुए हैं जमीन से
उनके बौडम अंग-विक्षेप से
साँस उखड़ने लगी है,
तब भी
आमद में उतरी उनकी
तमाम कारीगरी,
लयकारी,चक्करदार परनों
और विस्मित करनेवाली मुद्राओं को
नृत्य की संज्ञा दूँ
ऐसी बुद्धिहीन नहीं हूँ मैं.
-------------------------------- ३ अप्रैल
वैश्विक मौन
एक औरत रोटी बेलती है
आदमी खाता है,खाता रहता है
दूसरी औरत रोटी बेलती है
और खुद ही खाती है
एक तीसरी औरत है
जो युगों से भूखी है,मौन इंतज़ार में बैठी है
कोई आदमी आएगा ,पहले उसे रोटी देगा
वह तीसरी औरत कौन होगी
इस पर वैश्विक मौन है !!
(स्व.धूमिल से क्षमा याचना सहित)
-------------------- २० अप्रैल
लड़की जात हो
लड़की जात हो----ठठाकर मत हँसो
लड़की जात हो----पैर फैलाकर मत बैठो
लड़की जात हो----तनकर मत चलो
लड़की जात हो----सबके बीच बाल मत औंछो
लड़की जात हो ----गर्दन नीची रखो
लड़की जात हो ----नजरें झुकाए रखो
लड़की जात हो -----थोडा-सा करो और ज्यादातर मत करो
देह कन्या से बूढ़ी हो गई
पर दिमाग से नहीं गई---- लड़की जात …
---------------------------------------२९ जून
यूँ ही चली गई बारिश
यूँ ही दरवाजे से झाँककर चली गई बारिश
किसी मेहमान की तरह आकर चली गई बारिश
रूकती कुछ देर तो मैं भर लेती अपने रिक्त कलश
नम हो जाती जमीन तो डाल देती कुछ बीज
निचोड़ लेती अपने-आप को
बरामदा पौंछते- पौंछते
मिटा डालती
अपनी असफलताओं के दाग
पर यूँ ही दरवाजे से झाँककर चली गई बारिश
शिखर पर पहुँचे लोग
गुबार उड़ाते
गुज़र गये नज़दीक से
गर रुक जाती थोड़ी देर
तो धूल से सना चेहरा
हो जाता निर्मल
पर यूँ ही दरवाजे से झाँककर चली गई बारिश
आ जाती बहार किसी पेड़ पर
लद जाता कोई कोना फूलों से
और कुछ नहीं तो खिड़की में बैठकर
किसी की याद में गटक लेती एकाध हिचकी
पर यूँ ही दरवाजे से झाँककर चली गई बारिश
मेरे करीब बैठी मेरी प्रिय सखी
रूठकर अचानक चली गई
ऐसे चली गई बारिश
यूँ ही दरवाजे से झाँककर चली गई बारिश
किसी मेहमान की तरह आकर चली गई बारिश
-------------------------------------------८ जुलाई
माँ - सी !
जमीन पर हाथ टिकाकर
उठने बैठने से लेकर
बेटे की राह देखते
दरवाजे पर नमक रखने तक
मैं कई बार माँ जैसी हो गई
पर नहीं रख पाई
माँ जैसा सब्र
नहीं रह पाई
माँ जैसी हर हाल में खुश
और नहीं खोज पाई
दूसरों की खुशी में अपना सुख
माँ की आदतें तो खुद-ब-खुद
उतर गईं मेरे भीतर
पर माँ का सु-भाव
एक परायेपन के साथ
बाहर ही मँडराता रहा
माँ जैसी आदतों की वजह से
मुझसे कहा गया कितनी ही बार
कि तुम बिल्कुल वैसी ही हो
कई बार लोगों ने पहचान लिया
देख कर ही
और पूछा
कि मैं उनकी बेटी हूँ ना
कई - कई बार अच्छा लगा यह सब
पर मैं अशांत रही
बेचैन रही
और जब पलट कर देखा पीछे
तो पहचान गई
माँ की परछाई को
जो मेरे साथ साथ चलती है
और समाना चाहती है मुझ में
पर ठिठक जाती है बार-बार
कि जानती है मेरे मानस को
और समझ जाती है
कि कभी नहीं छू पाऊँगी
मैं माँ के अंतस को
सचमुच ! आसान नहीं होता
हूबहू माँ जैसा होना
या फिर माँ हो जाना..।
-------------------- २९ अगस्त
विश्वास
सड़क किनारे रखे
रंगीन पत्थरों को देख हाथ जोड़ते
चले जा रहे लोगों के
दीन - हीन चेहरे देखकर
लगता नहीं
कि सुकून
उनके आसपास भी
कभी मंडराया होगा
पर सड़क दर सड़क
पत्थर दर पत्थर
उनकी आस्था कहीं भी
कम नहीं होती
मैं भी खड़ी हो जाती हूं
कभी-कभी उनके नजदीक
उनके विश्वास को प्रणाम करने के लिए।
-------------------- ३१ अगस्त
शर्तें लागू
माँ बुलाती बेटे को
कहती---आजा !
बेटा ना-नुकुर करता
फिर हौले-से रख देता अपनी शर्तें
''अब मुझ पर गुस्सा तो नहीं करोगी ?''
"बरफ के गोले दिलवाओगी न ?"
माँ मुस्कुरा देती,
पिघल जाती बीच की दूरी
और बेटा दौड़कर लग जाता माँ के गले.
रूठने-मनाने का खेल ऐसे ही चलता रहा
शर्तों के पायदान पर
माँ को ऊपर
और ऊपर खड़ा करता रहा
बरफ का गोला पिज्जा हट में
तीन पहिये की साईकिल बाइक में
और खिलोने की घण्टी मोबाईल में बदल गई
माँ अब देहरी पर खडी रहती है
हर आहट पर चौंक जाती है
एक मोबाईल उसके पास भी रहता है
जो सन्नाटों के खोल में बंद होता है
वह देखना चाहती है बेटे का सलोना,सुदर्शन चेहरा
सुनना चाहती है उसी मीठी, पुरानी आवाज़ में
उसका 'माँ' कहना
वह बुलाती है उसे वैसे ही ''आजा!''
पर बेटा अब भी बंधा है शर्तों में
उसकी शर्तों में अब कुछ दिलाने का भाव नहीं है
वह डरता है कि अब माँ ही कहीं कुछ, माँग न बैठे
बेटे की "हाँ"में
"शर्तें लागू" यह भाव
वैधानिक चेतावनी की तरह छिपा रहता है,
हर युग में .
-------------------------------------९ अक्टूबर
देह का रास्ता
तुम आते रहे हमेशा मेरे द्वार
अलग-अलग स्वांग रचाकर
कभी सूरज, कभी चंदा,
कभी विष्णु,कभी शिव
कभी राम, कभी कृष्ण
कभी याज्ञवल्क्य , तो कभी गौतम
तुम्हारे लिए मै कभी अदिति बनी, कभी रोहिणी
कभी लक्ष्मी बनी, कभी पार्वती
कभी सीता बनी तो कभी राधा
कभी गार्गी, कभी अहल्या
और मुझे जबाला बनाना तो सबसे आसान रहा तुम्हारे लिए
हर युग में तुमने मुझे तदर्थ ही लिया
और मै निभाती रही संविदा की तरह
तुम्हारे नियमों को
आदि पुरूष ने देह का रास्ता दिखाया था
और तुम अटके हुए हो अभी भी वहीँ पर
लेकिन मुझे किसी भी शब्दकोश में
पुरूष या स्त्री का अर्थ
देह नहीं मिला
मैं भरोसा करती हूँ
शब्दकोशों पर !!!
--------------------------१३ अक्टूबर
सब ठीक है !
मैं ठीक हूँ
यह जताना नहीं पड़ता है
मुझे बार-बार
यों कि मेरे हाथों में नहीं है कोई छड़ी
अब भी चबा लेती हूँ, दांतों से
ककड़ी और बादाम की गिरी
दिख जाती हैं टीवी की छबियां
और छपे हुए अक्षर
माऊस चलाते हुए अब भी
कर्सर रूकता है सही जगह पर
नहीं जलती है तवे की रोटी
कटने-फटने पर अब भी
एक/दो बून्द ही सही
पर छलकता है खून
मेरे साथ-साथ चलती है
नींद और भूख
साडी की तहें जमा लेती हूँ
पहनने-ओढ़ने का उछाह बना हुआ है अब भी
हमला हुआ है झुर्रियों का छुट-पुट
पर सतर चाल वैसी ही है अब भी
खुले नल के साथ गुसलखाने में
निकल पड़ते है सुर अब भी
और खनकदार हँसी के मेरी
बहुतेरे कायल हैं अब भी
मैं ठीक हूँ
यह जताना नहीं पड़ता है
मुझे बार-बार
पर कुछ लोग हैं
जो जानते हैं
कि 'सब ठीक है' का सही नाटक
कर लेती हूँ,
मैं अब भी।
----------------------------१५ दिसम्बर
कुछ चाहा कुछ कहा
कहना चाहती थी तुमसे
छी: गंदे !
पर धीरे से मुस्कुरा कर रह गई
मन में तो था कि कहूँ
नहीं ऐसा नहीं करते
पर मैंने कहा
यह तुम्हारी निजी रुचि का प्रश्न है
बहुत जोर से डाँटना चाहा था
पर प्रत्यक्ष में हँसकर कहा
कोई बात नहीं
हो जाता है ऐसा कभी कभी
हर बात पर बहस अच्छी नहीं लगी मुझे
पर मैंने इसे सार्थक संवाद माना
साबित करना चाहा मैंने
अपने आप को समय के साथ चलते हुए
तुम्हें रोका नहीं कभी भी
बल्कि तेज चल कर कोशिश की
तुम्हारे साथ चलने की
मेरी असफलता का इससे बड़ा प्रमाण क्या
कि तुमने एक बार भी नहीं देखा पीछे मुड़कर
और जब तुम अपने आप रुके
तब रास्ते बंद थे आगे के।
-------------------- १६ दिसम्बर
समुद्र-से घर
वे दिन बीत गए
जब चम्मच गिनकर रखे जाते थे और
थाली-कटोरी पर लिखे नाम देखकर
उन्हें लौटाया जाता था
चाची,बुआ, मौसी को
उस अनुशासन पर्व में
एक चम्मच के गुम होने का अर्थ होता था
घर में आपातकाल का लागू होना।
किसी एक चम्मच का खोना,
उसे ढूंढ़ना और उसका मिल जाना
कोई मामूली घटना नहीं होती थी
उसमे छुपी होती थी
एक तरतीब,
एक तहजीब
किसी चीज का खोना
रिश्ते के टूटने का अहसास देता था।
अब किसी महंगे कपडे का जल जाना ,
खो जाना सोने की बाली
या यूँ ही कोई उठा ले जाय मेज पर से किताब
घर में मामूली-सी लहर उठती है।
चीजों से रिश्ता नहीं जुड़ता है किसी का भी
जैसे बारिश की बूंदों का नहीं होता
आपस में कोई जुड़ाव.
वे बहकर जा मिलती है समुद्र में
घर भी समुद्र होते जा रहे हैं इन दिनों.
----------------------१५ दिसम्बर
अचार की फाँक
वे सारे लोग धीरे-धीरे
ओझल होते चले गए दृष्टी पटल से
जिनका हम मुलाहिजा करते थे.
छोटी से छोटी बात में
उनकी अनुमति लेना
हमारी आदत में शुमार था
उनकी अनदेखी करने पर वे अक्सर चिढ़ते थे
उनकी भौहें तन जाती थी
और कभी कभी वे चीखने भी लगते थे
उनकी दहाड़ से थर्राता था पूरा मोहल्ला.
पर धीरे-धीरे वे सब
चुप होने लगे
उनसे कुछ पूछने पर
हाँ और ना के बीच में
हौले-से हिलती थी उनकी गर्दन
और हम सहुलियत से निकाल लेते थे उनके अर्थ
बाद के कुछ दिनों में
हमने उनसे कुछ भी पूछना बंद कर दिया
और उन्होंने भी बंद कर दिया
हमारी ओर देखना
उनकी इस गहन चुप्पी के बावजूद
उनका बना रहना भी
हमारे लिए खौफ़ पैदा करता था
प्रतिक्रिया न देना
उन्होंने अपना स्वभाव बना लिया था
पर आँख की नमी नहीं छुपा पाते थे वे
तीखे अचार की फाँक
पुरानी होने पर गलने लगती है
वैसे ही वे लोग भी
दिखने लगे थे नरम-मुलायम
न उनका नमक कम हुआ था
न उनका तीखापन
पर वे गलते रहे भीतर ही भीतर
और हम गर्वोन्नत
डोलते रहे इधर-उधर
आखिर वे निकल ही गए हमारे जीवन से
पर अब जब भी लगता है
कुछ नहीं बचा है
और जो है, वह फीके दाल चावल -सा है
तब वे याद आते हैं बेइंतहा
ठीक अचार की एक फाँक की तरह ..
ओझल होते चले गए दृष्टी पटल से
जिनका हम मुलाहिजा करते थे.
छोटी से छोटी बात में
उनकी अनुमति लेना
हमारी आदत में शुमार था
उनकी अनदेखी करने पर वे अक्सर चिढ़ते थे
उनकी भौहें तन जाती थी
और कभी कभी वे चीखने भी लगते थे
उनकी दहाड़ से थर्राता था पूरा मोहल्ला.
पर धीरे-धीरे वे सब
चुप होने लगे
उनसे कुछ पूछने पर
हाँ और ना के बीच में
हौले-से हिलती थी उनकी गर्दन
और हम सहुलियत से निकाल लेते थे उनके अर्थ
बाद के कुछ दिनों में
हमने उनसे कुछ भी पूछना बंद कर दिया
और उन्होंने भी बंद कर दिया
हमारी ओर देखना
उनकी इस गहन चुप्पी के बावजूद
उनका बना रहना भी
हमारे लिए खौफ़ पैदा करता था
प्रतिक्रिया न देना
उन्होंने अपना स्वभाव बना लिया था
पर आँख की नमी नहीं छुपा पाते थे वे
तीखे अचार की फाँक
पुरानी होने पर गलने लगती है
वैसे ही वे लोग भी
दिखने लगे थे नरम-मुलायम
न उनका नमक कम हुआ था
न उनका तीखापन
पर वे गलते रहे भीतर ही भीतर
और हम गर्वोन्नत
डोलते रहे इधर-उधर
आखिर वे निकल ही गए हमारे जीवन से
पर अब जब भी लगता है
कुछ नहीं बचा है
और जो है, वह फीके दाल चावल -सा है
तब वे याद आते हैं बेइंतहा
ठीक अचार की एक फाँक की तरह ..
--------------------------------१६ दिसम्बर
परिवहन के लोक में
ये बहुत पहले की बात है
जब मैं सफर करती थी
लोक परिवहन में
घर आकर रोज नहाती थी
घिस-घिस कर साफ़ करती थी उस छुअन को
जो कितने कितने चेहरों से
मुझे दिनभर मिलती रहती थी
रात भर शरीर साफ़ रहता था
पर चेहरे चिपके रहते थे यहाँ-वहाँ
दूसरे दिन नए चेहरे, नई गन्दगी
और नहाने का सिला वैसा ही बदस्तूर !
फिर मैंने एक वाहन जुटाया
शरीर तो बचा रहा
लेकिन हवा में उड़ते मेरे दुपट्टे
या साड़ी के पल्लू पर
छींटे फिर भी गिरते रहे
कई बार तो कोशिश हुई
पल्लू को कीचड़ में सान देने की
पर निकल आती रही मैं
आँचल बचाकर
सही सलामत
ऐसे ही बीत गए दशक पर दशक
देह थकने लगी
वाहन रूकने लगा
फिर जाना पड़ा शरण में
लोक परिवहन के
बालों की सफेदी, चेहरे की झुर्रियॉँ
आत्मविश्वास से लबरेज थी , इस बार मैं
लेकिन पहले ही दिन
फिर शुरू करना पड़ा
घर आकर नहाने का सिलसिला
और शरीर में समाती जा रही है
सड़ांध की शक्ल में
वही पुरानी बदबू ।
------------------------------३१ दिसम्बर
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