छोटी कवितायें

१. 

कुछ शाखाएं उम्मीद से दिखीं 

कुछ दिन बाद 

उनमें सिर्फ कोपल ही फूटी 

कभी किसी शाखा में 

कली और फिर फूल की उम्मीद 

बाकी है अभी .


सृजन थमता है क्या कभी ?


२. 

घर किसी से नहीं छूटता 

न तुमसे छूटा 

न मुझसे !!

घर को जतन भी हमने मिलकर किया 

न मेरा चौका छूटा 

न तुम्हारा ओटला !!!

३. 

तुम्हारी क्षुधा  के  लिए 

कोई रोटी पकाए

वह 'उसका' तुम्हारे प्रति प्रेम है.

तुम अपनी भूख के लिए 

उसका इस्तेमाल करो 

यह 'तुम्हारा' उसके प्रति प्रेम है. 


 प्रेम, वह व्यक्त करे या तुम

भूख हमेशा तुम्हारी ही होती है....

४. 

मत करो वर्णमाला में शामिल

किसी संधि में जगह मत दो

समास में रहने दो अपने पीछे 

मंजूर है.


एक बिनती है 

तत्सम ही रहने दो 

अपभ्रंश मत बनाओ 



मुश्किल हो जाता है

अपभ्रंश की जड़ें ढूँढना !!!


५.

कभी भारी भरकम 

तरबूज ने 

उसे पीछे धकेल दिया 


कभी छुई-मुई, नाजुक-सी 

आइसक्रीम से 

वह पिछड़ गया 


बाहरवाले समझ ही नहीं पाए 

कि केसरिया, रसीला आम 

अंदर ही अंदर 

कब गल गया 

कैसे सड़ गया !!!

६. 

मुझे पसंद है कपड़े धोना 

और धोने से पहले 

उन्हें मैला करना 


मुझे पसंद है मेहनत करना 

और अपने पसीने की 

गंध सूंघना 


मुझे मेरे हाथ बहुत पसंद है 

और पसंद है 

उनका खुरदुरा, झुर्रीदार होते जाना !!!

७. 

दूध सिंथेटिक है

मत पियो !

मैगी में , ब्रेड में

घातक द्रव्य है

मत खाओ !

सेवफल पर 

मोम चिपका होता है

मत चखो !

कौन सोचेगा 

कि सबसे ज्यादा घातक तो 

भूख होती है !!!

८. 

क्या कभी सो पाऊँगी 

सड़क पर पड़े कुत्ते की तरह 

आसपास के शोर से बेखबर


पेड़ की तरह स्वीकार कर पाऊंगी

पीले से हरा 

और फिर पीला होते जाना 


सड़क की तरह सह पाऊंगी 

किसी की मंजिल के लिए 

अपना कुचला जाना 


या फिर यूँ ही 

बजती रहूंगी थोथे चने जैसी 

और छलकती रहूंगी 

अधजल गगरी की तरह !!!


९. 

सोचती हूं 

जाने से पहले

सबकुछ ठीक ठाक,

साफ सुथरा, 

व्यवस्थित कर लूं ।

विरासत में कबाड़ 

तो नहीं छोड़ा जाता !!!


१०. 

फिसलने से गिरना अच्छा 

फिसलना यानि 

सिर्फ हवा में तैरना 

गिरने पर सहारा मिलता है 

जमीन का 

दोबारा उठकर खड़ा होने के लिए !!!

११. 

मैंने तुम्हें सब्जी का पूछा था 

तुम रोटी भी चट कर गए 

मेरी बात को कभी 

समझ ही नहीं पाए 

और मैं हमेशा की तरह 

सूखे हलक़ से 

टापती रह गई 

तुम्हारा मुंह !!!

१२. 

चन्दन समझते हो 

यह सोचकर 

अपने से अलग नहीं किया 

पर अपनी फुफकार से

 तुमने 

छलनी कर दी मेरी देह 

और अब 

वह घिसने से भी परे चली गई है ....!!!

१३. 

इसे दिखाऊंगी तुम्हें 

सोचकर रख दी सिरहाने 

रातभर आती रही वो सपनों में 

कविता ऐसी ही होती है 

न खुद सोती है , न सोने देती है .....

१४. 

मन तो होता ही है दोगला 

हमेशा रुलाने को 

रहता है तैयार 

पर तुम ? 

तुम भी शामिल हो जाते हो उसके साथ ?

और आते हो याद 

बार-बार...लगातार ....

१५. 

कभी साडी से सलवार सूट 

कभी लम्बे बालों से हो गई परकटी 

कभी उड़ा दी बिंदी  तो कभी चूड़ी

कभी होठों को रंगा लिपस्टिक से

चिन्हों का खेल खेला बहुत सफाई से  

पर शहर दूर ही रहा मुझसे 

किसी पर भी यकीन आ जाता है  

अब भी आसानी से ......

१६. 

चेहरों की इस किताब पर 

तुम्हारा लंबा अन्तराल 

मुझे गीला करता है बाहर से 

और सुखा देता है अन्दर से 

अबूझ रास्तों के निविड़ में 

तुम्हारा पता ढूँढने की 

हर कोशिश नाकाम हो जाती है 

जानती हूँ तुम्हारी मित्रता - सूची में 

एक नाम से ज्यादा नहीं हूँ मै 


पर मेरे भीतर की स्त्री ? 

पल भर में मित्र से माँ बन जाती है 

तुम शायद कभी यह समझ नहीं पाओगे 

कि मै तुम्हें पसंद करती हूँ और 

तुम मुझे करते हो सिर्फ लाइक


१७. 

पत्तों का झरना , 

पेड़  पचा जाता है 

आसानी से ...!!

और 

पत्तों का झरना 

पेड़ बचा जाता है

आसानी से..

१८. 

आकाश बदलता रहा 

अपने रंग 

कभी नीला,कभी काला, कभी मटमैला

पृथ्वी अविचल 

विस्मित-सी देखती रही 

पल प्रतिपल.

१९. 

सीखना चाहती हूँ 

उन रास्तों पर चलना

जहाँ सोचना बंद कर सकूं

बंद कर सकूं अपने स्पंदनों को

और भूल जाऊं कि मै ......हूँ...

मै क्या ???? 

२०. 

तुमने धीरे से मुझे अपने कन्धों से उतार दिया

और चले गए

ना जाने कहाँ

मै किससे पूँछु तुम्हारा पता 

ओ मेरे पिता ! 

२१. 

कितने ही ताप,संताप,उत्ताप

तब भी फैल ही नहीं पाई

सिकुड़ना,सिमटना समा गया था 

जड़ों से होता हुआ 

जींस में,कोशिकाओं में,

रक्त-कणों में,मांसपेशियों में,

इतना कि स्वेद-कणों को पोछने के लिए भी

हाथों को खोल ना पायी ....


२२. 

थके-हारे, उदासियाँ ओढ़े 

हम सो जाते हैं रात को 

पर वह चलती रहती है, अनवरत 

रोज ले जाती है हमें 

अँधेरे से उजास की ओर

पृथ्वी,

जैसे माँ हो हमारी. 

२३. 

तुम मेरी ज़िन्दगी में 

बहुत जरूरी थे 

नमक की तरह 

इन दिनों भूल जाती हूँ 

कभी-कभी 

सब्जी में नमक डालना 

क्या कभी 

तुम्हें भी ?

२४. 

सोचती हूँ 

जाने से पहले

सबकुछ ठीक ठाक,

साफ सुथरा, 

व्यवस्थित कर लूँ 

विरासत में कबाड़ 

तो नहीं छोड़ा जाता !!!

२५. 

तय तो यह हुआ था 

कि सब कुछ साझा होगा 

लेकिन ज्ञात हुआ है 

कि लाभांश तुम्हारे पास 

जो बिकाऊ होता  है


यह सूत्रों के हवाले से मिली 

सिर्फ एक खबर  नहीं है ।

२६. 

जड़ों की ओर लौट नहीं पता

कोई भी,कभी भी !

ऊपर उठने का अपना

एक अभिमान होता है

आहत होता है.....

२७. 

अक्सर छलता है

भीड़ का अकेलापन

तस्वीरों से भरी दीवारें....

उजाला दबोचता है बेपनाह

और छीन लेते हैं अपने ही प्रतिबिम्ब

सारे सरोकार !!.


२८. 

पृथ्वी पर जितना जल 

उससे ज्यादा थी 

तुम्हारी व्याप्ति मेरे मन में 

तुम चले गए और मैं 

जलमग्न हो गई पृथ्वी की तरह !!!

२९. 

ज-जोड़ का

घ-घटाव का

ग- गुणा का

भ-भाग का

सिर के ऊपर से गुजर गया

अंकगणित

३०. 

बेवक्त टपकते आँसू 

या अकेले में गूंजती मेरी हँसी 

शायद मुझे पागल करार देती हो..

पर इन्सान कहलाने के लिए

मैं तैयार हूँ

सहने को

कुछ भी

३१. 

मैंने उनसे वही पुरानी, 

घिसी पिटी बातें की 

ज्ञान बघारने के लिए 

'नैनं छिन्दन्ति' भी सुनाया ।


बाद में बचती रही 

उधर जाने से 

जिधर  टंगा था आईना ।

३२. 

हाथ को हौले -से सहला कर 

लिया था एक मूक वादा उससे 

कि बिदा की बेला में 

पलकें भीगेंगी नहीं 

फिर पता नहीं कैसे 

उसकी आँखों का रुका हुआ पानी

मेरी आँखों में झिलमिलाने लगा....!!!

३३. 

तुम अनुपस्थित थे

पूरे परिदृश्य में

और तभी मौजूद थे

मेरे भीतर

अपनी सम्पूर्णता के साथ...

३४. 

प्रेम क्या होता है ? 

मैं कहूँँ

कि मुझे बहुत 

गुस्सा आ रहा है 

और तुम लाड़ से हँस दो.

३५. 

कितनी ही बार ऊंगलियाँ कटी मेरी

हाथ जले कितनी ही बार

फिर भी ..........मैं ....


और तुम ?

चाकू छूने में भी सकुचाते हो

तीली पकड़ने में हिचकिचाते हो

फिर भी सोचते हो

कि मेरी जिम्मेदारी तुम पर है ।

३६. 

माँ में ईश्वर था 

या

ईश्वर में माँ

पता नहीं

पर दोनों प्रेम करते रहे मुझसे.

३७.

क्या चाहिए था 

और क्या मिला 

सवाल यह नहीं है !!!

सवाल यह है 

कि जो मिलना चाहिए था 

वह क्यों नहीं मिला ???

३८. 

बड़ा, बड़ा होता है

सुकून से रहता है 

हिरासत में 


जो मारा जाता है 

उसका कसूर सिर्फ इतना 

कि वह बिना सोचे - समझे 

भीड़ का हिस्सा बनाया जा चुका होता है ..


३९. 


 धीरे-धीरे मैं उम्र-दराज हो गई

कांच की चूड़ियों के टुकड़े,इमली के बीज

उठकर दौड़ पड़ने का माद्दा

बेवजह खिलखिलाना,रूठना और मनवाना

कितनी सारी थी पूँजी चुक गई

कीमती जेवर-कपड़ों से भरी अलमारियां,

सेफ की चाबियाँ और जमीनों के पंजीयन ने 

बदल दिए आल्हाद के आयाम


हँसी, अब आने के पहले वजह पूछती है

टप-टप बहने को आतुर आंसू,

सूख जाते हैं अन्दर ही अन्दर


मैं कहीं खो गई,सिर्फ छाया रह गई

धीरे-धीरे मैं उम्र-दराज हो गई


४०. 


मोड़ना चाहती थी

मैं मुड़ गई


झुकाना चाहती थी

मैं झुक गई


मनवाना चाहती थी

खुद ही मान गई


जीना चाहती थी

धीरे-धीरे मर गई…



४१. 


मुझे आज भी याद है 

मेरा वह जन्मदिन

जब मेरे बेटे ने

अपनी सारी सम्पत्ति 

कर दी थी मेरे नाम

अलमारी के अपने खाने से

वह निकाल लाया था छोटी-सी थैली

और उंडेल दी थी पूरी की पूरी 


थैली में था अनमोल खजाना

रंगीन कागज के टुकड़े,लिफाफों से काटकर 

निकाले गए टिकिट,इमली के बीज,

घिसकर छोटी हो गई पेंसिल और चौक ,

बीस और पच्चीस पैसे के दो सिक्के,

भौतिक रूप से मूल्यहीन  ऐसी ही तमाम चीजें,

और आखिर में गले से लिपटे वो नन्हे,कोमल हाथ.

---------------------------------- ३१ अगस्त १९९४ 




४२. 


मैं सुबह चौके में थी

तब मुझसे 

मेरी बेटी ने 

खिलौना माँगा

मैंने उसे अँगारे दिये

दहकते दो अँगारे


उसने उन्हें हाथ में पकड़ा

और खेलती रही

राख फूँक-फूँककर


न उसके हाथ जले

न वह रोयी

न चिल्लायी 

उसके हाथ पर फफोला तक नहीं था


उसकी नाल 

आग से ही जुड़ी थी

वहीं से वह सीखकर आयी थी

अँगारों पर चलना

अग्निपथ से गुजरना

--------------------------१९८०  


  ४३. 


मैं  सुबह दौड़ती रहती हूँ 

अपनी रसोई में 

बाद में  सड़क पर

अपने काम पर पहुँचने  के लिये 

दिन भर वहाँ भी रहती ही है भागम -भाग

खुद का अस्तित्व बचाने के लिये 



सोचती हूँ  

पहली बार क्यों दौड़ा होगा इंसान ?

पेट पालने के लिए 

दूसरों से आगे निकल जाने के लिये 

या फिर

मात्र अपना अस्तित्व बचाये  रखने के लिये  ?


४४.


थैली का दूध पड़े-पड़े सड़ जायेगा

अख़बार के पेज हवा के साथ उड़कर

कॉलोनी के हर दरवाजे पर दस्तक देंगे

पर मेरे महानगरीय पड़ोसियों को 

इस बात की कतई सुध नही होगी 

कि मै क्यों हूँ भीतर

घर के अंदर.


४५.


नारियल बन से गुजरते हुए

एक सन्नाटा ही तो था

जो मेरा अपना था


और वहीं हवा की नमीं

उतर गई गहराइयों तक मेरे भीतर

शायद बरस पड़े 

किसी और सन्नाटे में.


४६. 


बचपन में 

मुझे सिखाया गया था बोलना, 

शब्द, शब्दों के अर्थ 

और भाषा को तराशना 


अब मैं सीख रही हूं चुप रहना 

और मौन के बीच छुपे 

शब्दों के अर्थ खोजना


मौन की भी तो अपनी एक भाषा होती है !


४७. 


जब टूट पड़ेंगे किसी दिन 

मिलकर 

तब पता पड़ेगा 

सामूहिक का अर्थ 


अभी तो

सिर्फ रहते हैं 

हम 

समूहों में 


४८. 


मन तो होता ही है दोगला 

हमेशा रुलाने को 

रहता है तैयार 


पर तुम ? 

तुम भी शामिल हो जाते हो उसके साथ ?

और आते हो याद 

बारबार...लगातार ....


४९. 


जब भी लगती है कसकर भूख 

और बेतहाशा आते हैं झोंके 

नींद के 

मन पाता है असीम सुख 


यह सोचकर 

कि अब भी बचे हुए हैं लक्षण 

आम आदमी के 


५०. 


मेरे दुर्बल होने 

और तुम्हारे कद्दावर होने में 

सिर्फ एक रोटी का अंतर नहीं था 


एक रोटी कम खाना 

यह मेरा निर्णय था 

और बहुतेरा मुझे कम हासिल हो 

यह निरंतर तुम्हारा प्रयास रहा। 


५१. 


जब वह थककर बैठ गयी 

तब अकस्मात सतर्क हो गये सब 


पर जब वह थक रही थी 

तब कोई कुनमुनाया तक नहीं था। 


५२. बाहर जाते समय पहले वे पूछकर जाते थे

फिर कहकर जाने लगे

अब न पूछते हैं न बताते हैं वाहन की आवाज से मात्र सूचना प्रसारित करते हैं

बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते जाते हैं।


५३. 

जब तुम थे 

तो ढूंढती थी 

किसी और का अक्स 

तुम्हारे भीतर 


आँख उसके जैसी है 

बोलते इसके जैसे हो 

और तुम कहते थे 

उसे मेरा भरम 


और अब  तुम नहीं हो  

तलाशती हूँ 

दसियों में तुम्हारा प्रतिबिम्ब 

किसी की आँख तुम्हारे जैसी 

और किसी की आवाज 


भरम अब भी बना हुआ है .....


५४. 


तय तो यह हुआ था कि सब कुछ साझा होगा लेकिन ज्ञात हुआ है कि लाभांश तुम्हारे पास और वह तो एक कमोडिटी है । यह सूत्रों के हवाले से मिली सिर्फ एक खबर नहीं है ।




No comments:

Post a Comment