दो हजार चौदह

अनुक्रमणिका 

१.एक औरत का हैण्डबॅग २.अचानक ३. फ़र्क़  ४.सुरक्षा का प्रबंध ५.अपनी-अपनी औकात ६.तुम खुली रहा करो खिड़की ! ७.धूल ८.आतंकवाद  ९.सब कुछ तुम्हारा 


एक औरत का हैण्डबॅग

एक औरत का हैण्डबॅग

महज कुछ रुपयों से भरा झोला नहीं होता 

उसमें होती है घर की चाभियां 

जो उसे , उसके होने का अहसास दिलाती है 

बच्चों की फरमाइशें और बुजुर्गों की दवाइयां 

उसे लगातार जिम्मेदार बनाये रखती हैं


उसका प्राणप्रिय 

बॅग में रखा मोबाईल 

जिसमें सिमटी होती हैं रिश्तों की दुनिया 

और वह नहीं खोना चाहती 

कोई एक भी रिश्ता 


अंदर करीने से रखे कुछ कार्डस

जीवनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के सबूत

कुछ कागज इन्शुरन्स के ,

ड्रायविंग लायसेंस और पेन कार्ड 

उसके जिन्दा होने का प्रमाण 


कुछ रुपयों के लालच में बॅग छीने जाने का भय 

बना रहता है , हमेशा उसके मन में 

पर वह बचा लाती है , उसे घर तक 

मानो बचा लेती है अपना घर , अपना संसार , अपनी दुनिया !!

-------------------------------------------२७ फरवरी 

अचानक

सुबह-सुबह दूध का अचानक उफन जाना 
स्तब्ध कर देता है स्त्री को 
थम जाता है कुछ समय के लिए उसका सारा कामकाज 

कभी ऐसी ही आपाधापी में 
अचानक बजती है , दरवाजे की घंटी 
होता है कोई अतिथि 
और स्त्री का तमाम दिन बीतता है उथल-पुथल भरा 

मोबाईल पर अचानक 
किसी दूर के रिश्तेदार का नाम चमकता है 
और उसे घेर लेती है कई आशंकाएं 

अचानक खत्म हो जाती है रसोई गैस 
अचानक हड़ताल होती है पेट्रोल पम्प पर 
अचानक पता चलता है स्कूलों की छुट्टी के बारे में 
अचानक गायब हो जाती है 
महरी और साथ में बिजली भी 
अचानक बीमार पड़ जाता है साथी 

इन आकस्मिकताओं से जूझती 
चलती रहती है वह 
चलता रहता है उसका घर 
उसकी दुनिया 

तभी किसी दिन लगता है उसे 
काश ! सब कुछ तयशुदा हो 
पर अचानक झटकती है वह अपनी गर्दन 
और बुदबुदाती है --
नहीं मृत्यो ! तू भी ऐसे ही अचानक आना 
कभी महसूस हुई तेरी आहट,
सुन ली किसीने तेरी पदचाप 
भरभरा जायेगी सारी गृहस्थी ,
बिखर जायेगा परिवार 

अचानक चले जाना ही 
बर्दाश्त कर पायेगा यह घर 
वह भी नहीं देख पायेगी पड़े-पड़े कई दिनों तक 
घर का मकान में 
और इंसानों का खंडहर में तब्दील होते जाना.

वह यूँ ही चलते-फिरते 
घूमते-घामते
अचानक जाना चाहती है देवलोक
जैसे कई बार बहुत कुछ  हुआ है 
उसके साथ अचानक.
----------------------- ४ मार्च 

फ़र्क़ 

मुझे याद है 
मैंने वादा किया था तुमसे 
शनिवार की रात कहानी सुनाने का 
रविवार की शाम बगीचे में घूमने का 
इन्हें सुनते-सुनते 
हजारों शनिवार/ रविवार बीत गए तुम्हारे 
तुम्हें शायद यह सब याद न हो 
पर मुझे नहीं भूला है कुछ भी 

तुमसे बात करने की हूक उठती है किसी दिन
और तुम्हारे स्थिर चेहरे के साथ 
सन्देश झलकता है 
''माँ! थोड़ी देर बाद ''
वह थोड़ी देर, छुट्टीवाले दिन की 
सुबह में बदल जाती है 
आवाज आती है 
''उस दिन'' सब ठीक-ठाक तो था न 

कैसे बताऊँ ? सब ठीक ही है 
बस इतिहास दोहरा रहा है अपने-आप को 
तुममें और मुझमें फर्क इतना भर है 
कि तय दिन का तय समय 
तुमने रखा है मेरे लिए 
और मैं आज तक नहीं कर पाई हूँ पूरा 
शनिवार/रविवार के वादे को !!!
--------------------------------------- १५ मार्च  

सुरक्षा का प्रबंध


एक दुपट्टा पड़ा रहता है 
यूँ ही किसी कुर्सी पर ,
कहीं बिस्तर पर 
कि शायद काम आ जाय 
ठण्ड की हल्की सुरसुरी में 
या 
दरवाजे पर हुई किसी की आहट पर 

पर सिर्फ अहसास से नहीं हो पाता
सुरक्षा का प्रबंध
यूँ ही पड़ा रह जाता है दुपट्टा 
न ठण्ड से बचा पाता है
न लोगों की नजर से  
------------------------७ अगस्त

अपनी-अपनी औकात

चींटी! क्या समझती हो अपने आप को 
तुम्हें आटा दूँ 
तो तुम सिर पर चढ़ जाती हो 
काटने दौड़ती हो
अपनी औकात में रहो चींटी 
वरना तुम्हें मसलने में,रौंदने में 
देर ही कितनी लगती है 

चिड़िया! आ तुझे दाना-पानी दूँ 
पर खबरदार ज्यादा चिंचियाना नहीं 
ऊपर तक उड़ना नहीं
अपनी औकात में रहो चिड़िया 
तुम्हारे पर कतरने में,तुम्हारी आवाज बंद करने  में 
देर ही कितनी लगती है 

बकरी! आ तुझे घास खिलाऊँ
मिमियाती रहना मेरे आस-पास
पर दौड़ नहीं लगाना 
अपनी औकात में रहो बकरी 
ज्यादा दूर दौड़ी तो पकड़कर काट डालने  में 
देर ही कितनी लगती है 

मछली! अहा कितनी खूबसूरत हो तुम 
उस जलपात्र में नाचती रहो
चना-चबैना मिलता रहेगा तुम्हें 
पर बाहर झाँकने की कोशिश मत करना 
अपनी औकात में रहो मछली 
बाहर निकालकर तुम्हें तड़पाने में 
देर ही कितनी लगती है 

माता ! ओ गौ माता !
रोटी मिल रही हैं न रोज  तुम्हें 
अपनी आवाज रम्भाने तक ही रखना 
दोहन हो तब भी सिंग नहीं मारना 
अपनी औकात में रहो माते !
पालतू से आवारा बनाने  में 
देर ही कितनी लगती है 


और सुनो, तुम  !  
तुम  तो पहले ही सीख लो 
अपनी औकात में रहना 
वरना तुम्हें  मसलने में,रौंदने में ,
तुम्हारे  पर कतरने में,तुम्हारी  आवाज बंद करने  में ,
तुम्हें  आवारा बनाने  में, तड़पाने में, काट डालने  में ,
देर ही कितनी लगती है .
–--------------------------- १३अगस्त 

तुम खुली रहा करो खिड़की !

तुम तो स्वतंत्र हो 
खुली रहा करो खिड़की  
यूँ ही कोई आते - जाते 
दरवाजे की तरह
तुम्हें बन्द नहीं करता 
और वैसे भी दरवाजा बन्द हो 
तो खिड़की खुली रहना चाहिये 

तुमसे ही तो देख पाते हैं 
हम अपने हिस्से का आसमान 
चमकता चांद  
खिलते फूल 
और उड़ती चिड़ियांएँ  
तुम्हारे बंद रहने से 
बहुत कुछ छूट जाता है 

दरवाजों को तो आदत होती है 
बन्द होने की 
अंदर से बाहर से, कैसे भी 
पर सांस लेने के लिए 
जरूरत होती है तुम्हारी  

हम जो  दरवाजे के पीछे
धकेल दी जाती हैं 
तुम्हारे ही विश्वास पर जीती हैं 
तुम खुली रहा करो खिड़की !

-------------------- १५ अगस्त


धूल


तुम उसे हमेशा धूल समझते रहे 

पर तुम भूल गए 

कि धूल हमेशा ऊपर उठती है 

आँख में गड़ती है 

नाक में चुभती है 

सांस में अटकती है


धूल जब गुबार बनती है 

तो सिर्फ धूल ही होती है सब ओर 

वह बवंडर बनती है 

तो उड़ा ले जाती है सबकुछ 


धूल जब ऊपर उठती है 

तो अपनी औकात पर आती है 

और चटा देती है धूल सबको 


तुमने उसे हमेशा अपने पैरों की धूल समझा 

पर  तुम भूल गए 

कि धूल हमेशा ऊपर उठती है 

और पैर रहते हैं हमेशा  ही नीचे। 

------------------------------------१८ सितम्बर

आतंकवाद 

पड़ौस के घर से आ रही
बेलन और चिमटे की आवाज से भी
उद्वेलित हो जाती हूँ मैं


उधर की ओर मुँह कर
नकली हिम्मत के साथ
चिल्लाकर पूछती हूँ
''क्या हो रहा है यहाँ"
 
यों तो
सब्जी काटने के मामूली चाकू के अलावा
और कोई हथियार नहीं है
मेरे घर में  भी,
लेकिन डर उधर भी हावी हो जाता है
 
और शाम को हम दोनों अपने -अपने
आँगन में खड़े होकर
चिंता जाहिर करती हैं
समूचे विश्व में फ़ैल रहे है आतंकवाद पर.
----------------------------- १३ अक्टूबर

सब कुछ तुम्हारा

तन को भूल जाओ 
बाकी सब तो है ही तुम्हारा 
घर तुम्हारा
धन-दौलत
पैसा-टका
भाई-बहन
रिश्ते-नाते
जेवर-कपड़ा
खाना-पीना
घूमना-फिरना 
सब तुम्हारा/ तुम्हारी मर्जी से 
पूरी आज़ादी है तुम्हे 
बस नहीं है तो शरीर तुम्हारा 

प्यार करते हैं हम तुमसे 
सब दे तो रहे हैं तुम्हें, तुम्हारा ही है सब 
बस, देह  की बात न करो 
वह अच्छी/बुरी 
पवित्र/अपवित्र
इसकी या उसकी या सबकी 
ये सब  हम तय करेंगे 
इतनी-सी बात मान लो 
बाकी सारा जग तुम्हारा 
मेरी बिटिया!
मेरी बहना!
मेरी प्रिया!
तन को भूल जाओ 
बाकी सब तो है ही तुम्हारा !!!
-------------------------------६नवम्बर 


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