अनुक्रमणिका
१. कि तुम आदमी हो ! २. वृत्त की बदलती त्रिज्या ३. भाषा का फेर ४. कछुआ और खरगोश ५. होने दिया,पर ६. भूलने नहीं देते स्त्रीत्व ७. उल्टा दौड़ने की आदत ८. बन्द अलमारी ९. 'बाद में' का अर्थ १०. मेरे प्रेम में ११. एकांत १२.परिवेश १३. वर्धमान से महावीर १४. गरीब कभी भी रोता नहीं है ! १५. डरो मत ! १६. आदत १७. छोटी डंडियों का खो जाना १८. हाथ में आईना १९. निर्द्वन्द्व किताबें २०. मेरा - तुम्हारा उखड़ापन २१.स्वीकार कर लो अपनी हार ! २२. भरम २३. नहान आने के बाद २४. मुड़ी-तुड़ी चिन्दियाँ २५. एक कविता की वजह २६. मकान का घर होना २७. बदल दो सत्ता के आयाम २८. वर्गीकृत चिन्ता २९. कैसे मनाती होगी पृथ्वी नया साल
कि तुम आदमी हो !
मैं चींटी से डरती हूँ, कहीं काट न ले
मैं तिलचट्टे से डरती हूँ, कहीं घर पर कब्ज़ा न कर ले
मैं छिपकली से डरती हूँ कहीं ...
मैं चूहे से डरती हूँ ...
मैं बिल्ली से डरती हूँ ...
मैं कुत्ते से,सूअर से
केंचुए से, सांप से
सबसे डरती हूँ
मैं सबसे ज्यादा तुमसे डरती हूँ
पता चला है कि तुम आदमी हो
और भी बहुत कुछ सुना है तुम्हारे बारे में !!!
---------------------------------------२ फरवरी
वृत्त की बदलती त्रिज्या
स्केल से बनाए गए आयताकार वर्गाकार
तुम्हारे मकान में
मेरे लिए तय था
परकार से बना एक वृत्त
उस वृत्त की सारी त्रिज्याएँ
तय की थी तुमने
केन्द्र में भी तुम और
वृत्त के बाहर भी तुम
आयताकार वर्गाकार या समकोण
इनका कोई अर्थ
मेरे लिए अभिप्रेत नहीं था
वे मेरे लिए सिर्फ दीवारें थी
उन दीवारों पर ढूँढती थी मैं
अपनी ही कोई परछाई
ढूँढती थी कोई राह
चौखट से बाहर जाने की
मेरी छटपटाहट
जब चीखों में बदलने लगी
तो मुक्ति के नाम पर
वृत्त का दायरा
बड़ा, बड़ा और बड़ा होता चला गया
लेकिन रहा वह वृत्त ही
केन्द्र में और केन्द्र के बाहर रहे
हमेशा तुम ही
कभी किसी आयत या वर्ग पर
अपना नाम लिखा भी मैंने
तो तुम साथ नहीं थे
कभी मैंने तुम से लड़ कर
अपना नाम लिखा
या फिर तुम से बिछड़ कर
मैं तो चाहती थी
कि वृत्त में ही रहूं मैं
पर तुम्हारे साथ
आधा वृत्त मेरा आधा वृत्त तुम्हारा
मेरी ज़िद जब पैर पटकने लगी
तब तुमने मुझे वृत्त से बाहर तो निकाला
पर किसी और वृत्त में बिठा दिया
अब मेरी छटपटाहट, कुलबुलाहट चीखों को
एक बड़ा दायरा मिल गया है
और वृत्त अब आयताकार, वर्गाकार से
बड़ा हो गया है
तुम कल भी साथ नहीं थे
आज भी नहीं हो
बस फर्क इतना ही है
कि कल परकार से
वृत्त बनाते थे
अब कुछ बटन दबाकर
पूरी करते हो त्रिज्या ।
------------------- १ मार्च
भाषा का फेर
उन्हें नहीं पता
''कहिए'' लिखा जाता है या ''कहिये''
उन्हें यह भी नहीं पता
कि भाई में ''इ'' दीर्घ
और भाइयों में लघु क्यों हो जाती है
और उन्हें यह भी नहीं पता
कि मुझ जैसी बड़ी उम्र की औरत को
''आप'' कहा जाता है
''प्रणाम, प्रणाम'' कहा जाता है
वे आते हैं
घर से नहा-धोकर
चले आते हैं सीधे अंदर तक
''तम कैसी हो अम्मा '' कहते हुए
झुक जाते हैं पैरों पर
मैं सिकोड़ लेती हूँ अपने आप को
कि कहीं उनके कपड़े
मेरे कपड़ों से न छू न जाय !!
वह लड़की पच्चीस घंटों के हवाई सफर के बाद
आते ही सीधे लिपट जाती है गले से
''हाय आंटी ! हाऊ आर यु'' कहते हुए
और मैं उलझ जाती हूँ
भाषा के फेर में !!!
----------------------------- ३ मार्च
कछुआ और खरगोश
तुम्हें खरगोश की तरह
तेज दौड़ते देखा
और अपने कछुआ होने को
स्वीकार कर लिया
कई कई बार पछाड़ा तुमने
जानबूझकर
पीछे छोड़ दिया
पर हर बार हार को गले लगाकर
इंतज़ार करती रही
कि कभी किसी पल
थमोगे,बैठोगे,सुस्ताओगे
तो आगे निकलने की गुंजाइश
बची रहेगी मेरे सामने
ठीक उस कहानी की तरह
पर तुम कहानी के नायक नहीं
जीवन के अधिनायक हो
यह बार बार साबित किया
सतर्क रहे,
जब भी रुके
अधखुली आँखों से देखते रहे
और मेरे आगे निकलने का
जरा-सा अंदेशा होते ही
छलाँग लगाकर बढ़ गए दुबारा
और जीतते रहे
चालाकी से थामे रखा मुझे
कि हटने न पाऊँ मैं मुकाबले से
ताकि जीत का जश्न
मनाते रहो तुम
हर बार
बार बार ....!
---------------------- ९ मार्च
होने दिया,पर
दुख पहाड़ -सा
बहने लगा नदी-सा
बहने दिया !!!
मचलता था बच्चे-सा
संभलने लगा
संभलने दिया !!!
तपता था दोपहर-सा
ढलने लगा शाम-सा
ढलने दिया !!!
बैठा रहा मित्र-सा
जाने लगा दुश्मन-सा
जाने दिया !!!
बसने लगा था सांसों में
हटता ही नहीं था
हटा दिया !!!
----------------------- ११ मार्च
भूलने नहीं देते स्त्रीत्व
'अ' अनार का सीख रही थी
तभी दौड़ते-भागते
'ड' आ पहुंचा डर लेकर
और माँ ने पकड़ा दिया
'स' सुरक्षा का
सुगन्धित फूल की तरह खिल रहा स्त्रीत्व
अपने साथ 'ल' लज्जा का लेकर आया
और साथ-साथ चलते रहे 'ड' और 'स' भी
'ड' के साथ कई बार जोड़ना चाहा 'नि' को
निडर बनाने के लिए
पर यह न हो सका
'स' के साथ 'अ' जरूर जुड़ गया
अनजाने, अनचाहे
और 'स' सुरक्षा का असुरक्षित हो गया
हाँफते - हाँफते ,
थकी-मांदी
चढ़ ही गई किसी तरह कितने ही दशकों की सीढ़ियां
'अ' अनार का पीछे छूट गया था
धीरे -धीरे 'ड' डर का
और 'स' सुरक्षा का , जिसमें 'अ' जुड़ गया था
वह भी भूल गई मैं
'ल' लज्जा का भी कहीं गुम हो गया
अब मेरे साथ था
'म' मुक्त का
'ब' बेहिचक का
'ग' गरिमा का
'प' प्रणाम का
सब कुछ नया था
बस पुराना था तो अपने भीतर का
भरपूर स्त्रीत्व
उससे भी निवृृत्ति पाकर
मैं चलना चाहती थी
व्यक्ति के 'व' को साथ लेकर
लेकिन जल्दी ही जान गई
कि सब कुछ छोड़ा जा सकता है
पर अपने स्त्रीत्व को नहीं
याद दिलाता ही रहता है हर वक्त कोई न कोई
बहत्तर साल की उस नन के मुकाबले
अभी भी युवा हूँ मैं
और कितने ही कमज़र्फ़
घूम रहे हैं मेरे आस-पास भी .
(प. बंगाल में १३ मार्च २०१५ को बहत्तर वर्षीय एक नन के साथ कुछ युवाओं ने सामूहिक बलात्कार किया था, उसके बाद लिखी ये कविता)
---------------------------------------१७ मार्च
उल्टा दौड़ने की आदत
मैं बीसवीं सदी में
पैदा हुई
इक्कीसवीं सदी तक
जीती रही
और सोच मेरी सोयी
पड़ी रही अठारहवीं सदी की ओर
उनींदी आँखों से देखना चाहा
इक्कीसवीं सदी के एकाध पल को भी
तो कभी थपकी देकर
कभी डपट कर
कभी चपत लगाकर
और कभी धुनाई कर
धकेला जाता रहा अठारहवीं सदी की ओर
मैं अनायास ही जान गई
साम दाम दंड भेद के सिद्धांत
ऐसे ही बहुत कुछ
सिखाया गया मुझे
उंगली पकड़कर
कंठस्थ भी करवाया गया कुछ
और कुछ घुट्टी के रास्ते
पहुँचाया गया खून में
चरित्र-वरित्र लज्जा-वज्जा
संस्कार-वंस्कार परंपरा-वरंपरा
आँखों पर पट्टी कानों में रुई
आवाज फूटने का तो सवाल ही नहीं था
बच्चे की मानिंद लड़खड़ाते, दौड़ने की मेरी कोशिश
और पकड़ो भाग ना पाये का शोर
मेरे पीछे-पीछे
श्रांत - क्लांत
यथा स्थिति से संतुष्ट - सी
बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक आते-आते
कंधे पर लादे दो शतक
और एक आदत उल्टा दौड़ने की
बस मलाल सिर्फ इतना
कि पैदा क्यों न हुई अठारहवीं सदी में
खुश रहते सभी और शायद मैं भी !
------------------ २५ मार्च
बन्द अलमारी
भाई ने खास नज़र से
देखा मेरी ओर
और बोला माँ से
''वे लोग तैयार हैं''
माँ की दृष्टी का अर्थ
समझ किताब को बंद किया
और झुक गई सबके चरणों में
बाद में कितने ही दिनों तक
चरणों में ही झुकी रही
कोई भी दूसरा पेज खुला ही नहीं फिर
इस घर से उस घर तक के रास्ते में
जरी की साड़ियों के साथ
एक पेटी और भी थी अलग से.
नीची गर्दन से मैंने महसूस की
चढ़ी हुई भौंहें, माथे पर पड़े बल
और फूले हुए नथुने
मेरी जुबान की मानिंद
वह पेटी भी बंद रही बरसों बरस
दिवाली पर
इनाम की तरह मिलनेवाली साड़ी की जगह
एक बार मांग ली
हिम्मत कर एक अलमारी
बन्द पड़ी किताबों के लिए.
उसके ताले पर लटकी चाबी
आज भी खिजाती है मुझे
पर इतने दशकों में वह भी
भूल गई होगी खुलना
जैसे मैं भूल गई हूँ
अपनी मर्जी से देहरी को लांघना।
----------------------------२८ अप्रैल
'बाद में' का अर्थ
बचपन में माँ को देखती
वह परातभर आटा गूंधती
टोकरीभर रोटियां बनाती
झाड़ती-बुहारती
घर आँगन लीपती
दीवार और छत को छाबती
कुएं से पानी खींचकर
कपड़े धोती,बर्तन मलती
मैं भी जिद करती,मचलती
माँ मैं रोटी बनाऊंगी,बर्तन धोऊंगी
माँ कहती-बाद में
मैं कहती-नहीं,अभी
माँ के 'बाद में' का अर्थ
बहुत बाद में समझ में आया
तब तक मैं देखती रही
माँ जैसी बनने का सपना
आखिर सपना पूरा हुआ
बर्तन-भांडे
झाड़ू-पौंछा
चक्की-चूल्हा
ता-उम्र जीती रही
इसके साथ
और ख़ुशी मनाती रही
सपने के पूरा होने की
कैसा भी हो, किसी का भी हो
सपना तो सपना होता है !!!
----------------------------- ४ मई
मेरे प्रेम में
मेरे प्रेम में गुलमोहर की छाँव नहीं थी
मेरे प्रेम में गुलाब की पंखुड़ियां नहीं थी
केवड़े की खुशबू नहीं थी
तितली के रंग नहीं थे
सावन की फुहारें नहीं थी
खग की ऊँची उड़ान नहीं थी
चिड़िया का फुदकना नहीं था
मोर का नृत्य नहीं था
हरा नहीं, पीला था मेरा प्रेम
पर आम जैसा रसीला नहीं था
फिर भी मैंने प्रेम किया
मैं वही कर सकती थी
जो मेरे वश में था
और मैंने प्रेम किया !!!
मेरे प्रेम में गुलाब की पंखुड़ियां नहीं थी
केवड़े की खुशबू नहीं थी
तितली के रंग नहीं थे
सावन की फुहारें नहीं थी
खग की ऊँची उड़ान नहीं थी
चिड़िया का फुदकना नहीं था
मोर का नृत्य नहीं था
हरा नहीं, पीला था मेरा प्रेम
पर आम जैसा रसीला नहीं था
फिर भी मैंने प्रेम किया
मैं वही कर सकती थी
जो मेरे वश में था
और मैंने प्रेम किया !!!
----------------------५ मई
एकांत
घर पर अकेले रहना
अकेले होना कहाँ होता है
चारों ओर उठी दीवारें
साथ होती हैं सदैव,
लड़खड़ाने पर सहारे के लिए
और छत भी तो होती है अपनी
आश्रय देती है
पर सहारा होता है उसका
जमीन होती है
जो बिछने देती है,
अपने ऊपर पैर रखने देती है,
टिकने देती है
चारों ओर भीड़ हो
तभी तो होता है अकेलापन
कितने ही लोग होते हैं साथ में
पर दीवारों की तरह उन पर
हाथ नहीं टिका सकते
छत की तरह उनसे
आसरा नहीं माँग सकते
अकेले ही होते हैं
हम हर जगह
पर अकेले होने का मतलब
अकेलापन नहीं होता ।
------------------- २० मई
परिवेश
सुबह उठते ही खोल देती हूँ
दरवाजे, खिड़कियाँ
घर भर जाता है उजास से
और बचा लेती हूँ वह ऊर्जा
जो धातु के कुछ तारों के सहारे
आती है मेरे घर में
नन्हा सूरज कुछ बड़ा हो जाता है
तब उसके ताप में
रखती हूँ कुछ पकने के लिए
साथ में एक बाल्टी पानी,खुद के लिए
इस तरह बची रहती है
लाल टंकी में रखी वह महँगी आग
निकलती हूँ बाहर
चलती हूँ पैदल
घूम आती हूँ
दो-चार किलोमीटर यूँ ही
बच ही जाती है थोड़ी अश्व शक्ति
जो दौड़ती है, चार पहियों के सहारे .
मेरी बैग में
कागज के टुकड़े नहीं
महज प्लास्टिक के कुछ कार्ड होते हैं
और होता है एक छोटा-सा चलित यंत्र
जिनके सहारे भर लेती हूँ
अपने हाथ की
पुराने कपड़ों से बनी थैलियाँ
घर लौटती हूँ तब तक
सुबह का वह नन्हा बच्चा
अपनी आयु पूरी करके डूबने को होता है
उसकी गर्मी से पाती हूँ
अपने आप को ऊष्मा से भरपूर
उसके जीवित रहते ही
निपटाती हूँ,बचा-खुचा
निरंतर,शाश्वत.
शाम ढले तेल में डूबी बाती के साथ
मिटटी का दिया
दूर कर देता है ,
मेरे घर का घना अँधेरा
लगी रहती हूँ दिनभर
कि बचा लूँ कुछ बिजली,
कुछ गैस,कुछ पेट्रोल,कुछ कागज
कम करूँ अपनी ओर से वैश्विक ऊष्मा
और बढ़ने न दूँ ओजोन के छिद्रों को
और कोशिश करती हूँ कि
मेरी ये छोटी-छोटी बचत
शायद बचा ले थोड़ा-सा
मेरा परिवेश,मेरा शहर,मेरा देश !!!
–-------------------------------- २७ मई
वर्धमान से महावीर
सोचती हूँ
किसी दिन निकल जाऊं
घर छोड़कर
बहुत हुआ भटकना
मन के बियाबान में
अब शरीर को दिखाऊं
असलीवाला जंगल
और पता करूँ
कैसे होता है, बिना छत के रहना
सोचती हूँ
किसी दिन कुछ भी न पकाऊं
सो जाऊं ऐसे ही
घुटने पेट के पास मोड़कर
महसूस करूँ भूख को
जिसे बहुत पढ़ा है
अख़बारों में, किताबों में,कहानियों में
सोचती तो यह भी हूँ
कि जब भी निकलूं घर से
निर्वसन ही रहूँ
धूप में जलूं,बारिश में भींगू,ठण्ड में कांपू
बहुत बखान सुना है
रोटी,कपड़ा और मकान का
जानती हूँ
भूखी तो रह लूंगी कुछ दिन
और बिना छत के भी
पर निर्वस्त्र होना आसान नहीं है
बहुत मुश्किल होता है
वर्धमान से महावीर होते जाना !
घर छोड़कर
बहुत हुआ भटकना
मन के बियाबान में
अब शरीर को दिखाऊं
असलीवाला जंगल
और पता करूँ
कैसे होता है, बिना छत के रहना
सोचती हूँ
किसी दिन कुछ भी न पकाऊं
सो जाऊं ऐसे ही
घुटने पेट के पास मोड़कर
महसूस करूँ भूख को
जिसे बहुत पढ़ा है
अख़बारों में, किताबों में,कहानियों में
सोचती तो यह भी हूँ
कि जब भी निकलूं घर से
निर्वसन ही रहूँ
धूप में जलूं,बारिश में भींगू,ठण्ड में कांपू
बहुत बखान सुना है
रोटी,कपड़ा और मकान का
जानती हूँ
भूखी तो रह लूंगी कुछ दिन
और बिना छत के भी
पर निर्वस्त्र होना आसान नहीं है
बहुत मुश्किल होता है
वर्धमान से महावीर होते जाना !
-----------------------३१ मई
गरीब कभी भी रोता नहीं है !
मैंने कभी किसी गरीब को
अपनी गरीबी पर रोते नहीं देखा है
अक्सर गरीबी का रोना
वे रोते हैं
जिनका बैंक में एक खाता होता है
और खाते में इतना धन नहीं होता
जितना वे चाहते हैं
मैंने कभी किसी असली गरीब को
अपनी गरीबी पर रोते नहीं देखा है
असली गरीब तब रोता है
जब वह असहाय होता है
और जब वह रोता है
तो बुक्का फाड़कर रोता है
सफेद कपड़ों में सफेद रुमाल से
गॉगल के भीतर अपनी आँखों के
नम होने का नाटक वह नहीं करता
वह खीझता है झुंझलाता है
परेशान होता है हलकान होता है
पर रोता नहीं है
वह पैरों पर बैठकर आसमान निहारता है
अपने हाथों को देखता है
उसे ईश्वर की दयालुता पर
अपने हाथों की ताकत पर
विश्वास होता है
वह बिना बात भी खुलकर हँसता है
शादी - ब्याह में पूरे मन से नाचता है
सोमवती अमावस के नाम पर
नदी किनारे पर्यटन कर आता है
काल भैरव के बहाने
दो - चार घूँट भी गटक लेता है
और ना हो कुछ भी तो पानी पीकर सो जाता है
पर असली गरीब कभी भी अपनी गरीबी पर नहीं रोता है ।
-------------------- ८ जून
डरो मत !
मत देखो मुड़कर !
आती रहेगी पीछे-पीछे
कहीं नहीं जाएगी
वैसा सोचेगी भी नहीं
टीकाकरण हुआ है
उसके मस्तिष्क का
ताकि सोच के दरवाजे
बंद रह सकें हमेशा के लिए
इसलिए डरो मत!
तुम्हारे बनाये कुएँ में ही
करती रहेगी उछल कूद
मेंढक की तरह
जब भी ढोना होगा
तुम्हें, तुम्हारे घर को
गधे की तरह डाल सकते हो
उस पर अपना बोझा, निर्द्वन्द्व होकर
उसके रेंकने या दुलत्ती झाड़ने का
कोई वज़ूद नहीं होता
एक आध बार कोंचना ही काफी होता है
उसके लिए
जहाँ जाना चाहो,
जैसे ले जाना चाहो
वह तत्पर रहेगी हमेशा
यकीन रखो!
तेज दौड़ेगी
नाल ठुकी है
उसके पैरों में, जन्मजात
और नकाब के साथ ही
पैदा हुई है वह
बिल्कुल नहीं देखेगी इधर-उधर
जरा-सा चाबुक फटकारना
काफी है उसके लिए
विश्वास रखो!
उसके रहते भूखे नहीं रहोगे कभी भी
वह जुती रहेगी बैल की तरह
और उगती रहेगी फसल की तरह हमेशा
पड़ी रहेगी शवासन में
जब तुम नोचोगे उसे
गिद्ध की तरह
बस, नजर रखना!
उस पर कहीं वह धूर्त, चतुर, चालाक
कौवा ना बन जाए
और हो सकता है
कि तुम वंचित रह जाओ
अंतिम समय में
काकस्पर्श से ।
-------------------- १४ जून
आदत
कितनी ही बार पहाड़ चढ़ा
अपनी ही सांस को फूलते देखा
और अब उतार पर भी
नहीं हो पा रही हूँ खाली
दरवाजे सबके बन्द रहते हैं
शायद किसी को
पता भी नहीं चलेगा
सड़ांध के फैलने तक
चार लोग जुट तो जाएंगे ना ?
फोटो के साथ
अखबार में खबर छपेगी क्या ?
किसी को शिकायत तो नहीं रहेगी
कि पता ही नहीं चला
कोई कहेगा ओह!
कोई और - अरे!
और वह तीसरा-- च् च् करेगा
किसी की आँख भर आएगी
कोई किसी के कंधे पर हाथ रखेगा
होगा सब कुछ
वैसा ही होगा
पर अपने सिर पर बोझा ढोने की आदत नहीं छूट रही है।
बस, इतना ही!
-------------------- २० जून
छोटी डंडियों का खो जाना
इस बड़े शहर में कभी-कभी
अपने ही हाथ में
छोटी छोटी डंडियों के लिए
तरस जाती हूं मैं
उनकी तलाश में नाप आती हूँ
पैंतीस वर्ग किलोमीटर का दायरा
डंडियाँ फिर भी नहीं मिलती
बच्चों को लौटने में देर हो जाय
तो जैसे हर आहट पर दौड़ जाती थी
ठीक वैसे ही उठा-उठा कर देखती हूँ
इस बित्ते भर के यंत्र को
यकायक चेतन होता है वह
और आने लगते हैं संदेश, चिट्ठियाँ और बुलावे
आखिर में गूँजते हैं दो मीठे स्वर
जिन के लिए तरसती रहती हूँ सारा दिन
नाद अलग-अलग पर लहज़ा एक ही होता है
हम लाचार हैं
बाहर रहना पड़ता है
पर तुम्हारा पहुँच क्षेत्र से बाहर होना
हमारे लिए दु:स्वप्न होता है
डंडियाँ छोटी-छोटी
पर उनका खोना
कितना पीड़ादायक होता है!
--------------------- २२ जून
हाथ में आईना
रोज मैं हिंसा करती हूँ,अपना ही वध करती हूँ
धुँआ धुँआ आँखें हैं, सपनों से पनीली करती हूँ
बुझती नहीं जलती हूँ,जलते हुए भी चलती हूँ
पूछनेवालों से बचती हूँ,आईना हाथ में रखती हूँ
पाहन कभी पूजा नहीं,दिया बाती करती हूँ
प्रेम तो लबालब है मुझमें पंचायतों से डरती हूँ
पत्थर दिखा जो हाथों में,तो गर्दन झुका लेती हूँ
बर्दाश्त कुछ होता नहीं,सहने की बातें करती हूँ
आना जाना चिट्ठी पत्री,कुछ भी नहीं कर पाती हूँ
अपने मन की बातें फिर,यूँ कविता में कहती हूँ।
-------------------- १२ सितम्बर
निर्द्वन्द्व किताबें
राज्य परिवहन निगम की
बसों की तरह
बसों की तरह
जब ठसाठस भर गईं अलमारियां
तो किताबें चुपचाप बाहर निकल आईं
और अपने लिए जगह बना ली
पलंग के कोने पर
खाने की मेज पर
सोफे के हत्थों पर
यहाँ तक कि फ्रिज पर भी
और रच बस गईं सहजता से
जैसे रम जाता है कोई आप्रवासी
नए शहर में
किताबों को पता था
कि रेशमी साड़ियां और असली-नकली गहने
अविव्य* की तरह
अलमारियों में भले जगह पा लें
पर रास नहीं आएगी उन्हें
बाहर की दुनिया
अविव्य बंद रहेंगे सदा खोल में
और किताबें, आम आदमी की तरह
घूमेंगी निर्द्वंद्व पूरे जगत में
उन्हें जरूरत नहीं होगी
किसी प्रहरी की
साडी और गहने बाहर निकले भी तो
बनी रहेगी हमेशा एक दूरी
किताबों के लिए आसान होता है
साधारण आदमी की तरह घुलना-मिलना
और ह्रदय से सम्मानित होना
एक अनपढ़ भी
सर माथे रखता है किताबों को
और ख़ौफ़ खाता है
आभूषण और आभरण से
किताबें नहीं घबराती परिवर्तन से
बाहर नहीं होती कभी चलन से
उनका स्थान पक्का होता है
और पक्का होता है मान-सम्मान
उनका पुराना होते जाना
किसी बुजुर्ग-सी हैसियत पाता है
और उन्हें भय नहीं होता
फेंकने या बेचे जाने का
यहाँ-वहां बिखरी किताबें
और उनका साथ
निर्भय बनाता है मुझे
गहरी नींद में सुलाता है
गहने डराते हैं, सोने नहीं देते
इन दिनों मैंने ख़ारिज कर दिया है
किताबों के लिए अलमारी खरीदने का प्रस्ताव
मुझे नापसंद है किसी का अविव्य होते जाना !!!
*अति विशिष्ट व्यक्ति
तो किताबें चुपचाप बाहर निकल आईं
और अपने लिए जगह बना ली
पलंग के कोने पर
खाने की मेज पर
सोफे के हत्थों पर
यहाँ तक कि फ्रिज पर भी
और रच बस गईं सहजता से
जैसे रम जाता है कोई आप्रवासी
नए शहर में
किताबों को पता था
कि रेशमी साड़ियां और असली-नकली गहने
अविव्य* की तरह
अलमारियों में भले जगह पा लें
पर रास नहीं आएगी उन्हें
बाहर की दुनिया
अविव्य बंद रहेंगे सदा खोल में
और किताबें, आम आदमी की तरह
घूमेंगी निर्द्वंद्व पूरे जगत में
उन्हें जरूरत नहीं होगी
किसी प्रहरी की
साडी और गहने बाहर निकले भी तो
बनी रहेगी हमेशा एक दूरी
किताबों के लिए आसान होता है
साधारण आदमी की तरह घुलना-मिलना
और ह्रदय से सम्मानित होना
एक अनपढ़ भी
सर माथे रखता है किताबों को
और ख़ौफ़ खाता है
आभूषण और आभरण से
किताबें नहीं घबराती परिवर्तन से
बाहर नहीं होती कभी चलन से
उनका स्थान पक्का होता है
और पक्का होता है मान-सम्मान
उनका पुराना होते जाना
किसी बुजुर्ग-सी हैसियत पाता है
और उन्हें भय नहीं होता
फेंकने या बेचे जाने का
यहाँ-वहां बिखरी किताबें
और उनका साथ
निर्भय बनाता है मुझे
गहरी नींद में सुलाता है
गहने डराते हैं, सोने नहीं देते
इन दिनों मैंने ख़ारिज कर दिया है
किताबों के लिए अलमारी खरीदने का प्रस्ताव
मुझे नापसंद है किसी का अविव्य होते जाना !!!
*अति विशिष्ट व्यक्ति
-----------------------------३० सितम्बर
मेरा - तुम्हारा उखड़ापन
कोई चारा न देख कर
मैं चढ़ा लेती थी अपनी उंगलियों पर
नेल पॉलिश की एक और परत
हटाने से ज्यादा आसान लगता था मुझे
बदरंगापन ढाँक लेना
एक और परत से
फिर मुझे याद ही नहीं रहा
अपने नाखूनों का असली रंग
पता नहीं सफेद था या गुलाबी
अपने ऊपर तुम्हारी परतें भी तो मैंने
ऐसे ही चढ़ा ली थी
बचा लिया था
मेरा - तुम्हारा उखड़ापन
और भूलती चली गई
खुद का असली रंग ।
-------------------- ४ अक्टूबर
स्वीकार कर लो अपनी हार !
तुमने मुझे भूख क्यों दी
तुमने मुझे नींद क्यों दी
क्यों दिए आँसू
और क्यों दी हँसी
खून की क्या जरुरत थी
और क्यों जरूरी थी साँसें
रहने देते निराकार ही मुझे
ठीक तुम्हारी तरह
रहने देते निर्मोही मुझे
जैसे हो तुम
मैं भी रहकर देखती
बिना हाड़माँस के
बनकर रहती
पाहन और अमर
तुम्हारी तरह
मुझे मनुष्य बनाया तुमने
तो क्या तीर मारा मैंने
और मुझे यह जनम देकर
तुमने भी कौन सा तीर मारा
अब बस स्वीकार कर लो अपनी हार तुम !
-------------------- १० अक्टूबर
भरम
जब तुम थे
तो ढूँढती थी
किसी और का अक्स तुम्हारे भीतर
आँखें उसके जैसी है
और बोलते इसके जैसे हो
तुम इसे कहते थे मेरा भरम
और अब तुम नहीं हो
तो तलाशती हूँ दसियों में
तुम्हारा प्रतिबिंब
किसी की आँखें तुम्हारे जैसी
और किसी की आवाज
भरम अभी बना हुआ है।
-------------------- १८अक्टूबर
नहान आने के बाद
मैं कम्प्यूटर पर काम करती हूँ
तब वह अपने पल्लू को
बेवजह ठीक करते हुए
झांककर देखती है स्क्रीन में
और मेरा प्रोफाइल फोटो देखकर
खुश हो जाती है.
मेरे पैरों के नीचे से
आहिस्ता से झाड़ू निकालते हुए
कहती है-आपका अख़बार में छपा फोटु
दिखाया था तेरह नंबर वाली दीदी ने
मैं धीरे से, नपी तुली मुस्कान के साथ
गर्दन हिलाती हूँ
तभी घनघनाती है घंटी
कहती हूँ-- जरा उठाना उसे
उठाकर देते हुए उसकी नजर
मेरे कीमती मोबाईल,
नर्म मुलायम हथेली
और नेल पेंट से रंगे नाखूनों पर होती है
यकायक बोल उठती है,
नाटक के स्वगत की तरह
मुझे भी पढ़ना था
पर नहान आते ही
भेज दिया उन लोगों ने यहाँ
पढाई की बात को इम्प्रोवाइज करती है
और बताने लगती है
जेठ-ननदोई की बुरी नजर के बारे में
उसके सारे सम्बोधन
सिमटे रहते हैं
'इन लोग' और 'उन लोग' में
उसे भरम है
कि पढ़ी लिखी होती
तो शायद 'इनका' और 'उनका'
विरोध कर पाती
बुरी नजर से बची रह पाती
मैं उसका भरम तोडना नहीं चाहती
उसे नहीं बताती
कि नहान आने पर
उसके लोगों में और मेरे लोगों में
कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता
नर्म, मुलायम,रंगी-पुती उँगलियाँ
की बोर्ड पर चलें या चकले पर
कुत्तों और भेड़ियों की नजर नहीं बदलती
अख़बार में छपा फोटो
सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देता
मैं उसे यह भी नहीं बताती
कि उनकी समाजवादी नजर में
उसके और मेरे अलग होने का कोई अर्थ नहीं होता
साक्षर/निरक्षर होना कोई मायने नहीं रखता
उनके लिए
नहान आने के बाद
लड़की का स्त्री में बदल जाना ही
सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है।
-------------------- ३० नवम्बर
मुड़ी-तुड़ी चिन्दियाँ
मैं अक्सर स्त्री विमर्श की बात करती हूँ
मैं बताती रहती हूँ सरेआम
कि मेरे घर के पुरुष
काम में हाथ नहीं बँटाते
कि मुझे एकाध बार लेना पड़ती है
कहीं जाने की अनुमति
कि बच्चे की बीमारी में
रुकना पड़ता है मुझे ही घर पर
या कि मेहमानों का जिम्मा होता है
अंतत:मुझ पर .
रिश्तेदारी निभाना
लगती है मुझे महति जिम्मेदारी
मुझे ही देखना पड़ता है
कितना बाकी है महीना
और कितनी शेष है
दाल-चावल,भाजी-तरकारी.
पृथ्वी की तरह
अपनी ही धुरी पर
आत्म मुग्ध घूमती रहती हूँ
और सूर्य के आसपास रहने से
मिलती है जो ऊर्जा,ऊष्मा
उसे ताप कहकर खारिज करती रहती हूँ
उस समय मुझे नहीं याद आती
गढ़ चिरोली के जंगलों में रहनेवाली
वह आदिवासिन
जो हर महीने उन दिनों
चिथड़ों में रेत भरकर बांधती है
सृजन की रक्तिम बूंदों को
और निकल पड़ती है लकड़ी बीनने
मैं कमाठीपुरा की
उन औरतों को भी भूल जाती हूँ
जो बिकती हैं, सब्जी-भाजी की तरह
उन्हें बैठने की अनुमति नहीं होती .
मेरे हमाम से भी कम जगह में
ठूंस-ठूंसकर खड़ा किया जाता है उन्हें
और आवाज दे-देकर
बिकवाती हैं खुद ही, खुद को ताजा कह-कहकर
मैं भूल जाती हूँ उस औरत को भी
जिसका आदमी उसकी योनि पर
ताला लगाकर जाता है दिहाड़ी पर
मैं अपने घर से निकलकर
पहुँच जाती हूँ कहीं भी
जोश खरोश से भाषण झाड़ने,
गिनवाती हूँ अपनी तकलीफें
वृहद आकार में
और बटोरती हूँ तालियॉँ दर्जनों में
क्या मैं सचमुच जानती हूँ स्त्री के दुख को
क्या मुझे पता है
कैसे होता है
बिना घर के, बिना दीवार के
बिना प्रेम के, बिना सुरक्षा के रहना
बिना आशा के, बिना विश्वास के जीना
लेकिन मैं इतना जानती हूँ
कि बेहद आसान है
अख़बार के शीर्षकों में बने रहना
पर बिलकुल भी आसान नहीं है
मुड़ी-तुड़ी चिन्दियों की तरह
किसी अँधेरे कोने में पड़े रहना .....
-------------------- १ दिसम्बर
एक कविता की वजह
गली के आवारा लड़के की तरह
दुख घूमता रहता है इधर - उधर
हर घर पर रहती है उसकी नजर
पड़ौस के बदतमीज बिगड़ैल बच्चे जैसा
दुख आता है यकायक
कभी भी, किसी भी दिन
और उसकी नजर बचाकर
सहेजना पड़ते हैं अंतस में कुछ नग
किसी गरीब की तरह
कुपोषित होकर भी जीता रहता है दुख
उसे धकियाने पर फुँफकारता है वह
कब्जा कर लेता है दुख
अनचाहे मेहमान की भाँति
सारे घर पर
कभी कभी अजगर होकर
निगल जाता है पूरे घर को
कभी चीते की तरह झपट्टा मारता है दुख
और अधमरा कर देता है
खुद होकर जाता नहीं है
हकालना पड़ता है
फिर - फिर लौटकर आता है दुख
पालतू कुत्ते - बिल्ली की मानिंद
दुख धूप में सूखता नहीं है
बारिश में भीगता नहीं है
और बन जाता है किसी दिन
एक कविता की वजह ।
-------------------- ४ दिसम्बर
मकान का घर होना
अकस्मात बढ़ गई
हलचल देखकर
चौंक जाता है मकान
दीवारें ताकती हैं प्रश्नार्थक नजरों से
छत के माथे पर उभर आती है
चिंता की लकीरें
दरवाजा अधखुला-सा होकर
आहट लेता है हर पदचाप की
पेड़ की डालियाँ झाँक-झाँककर
सुराग लेती हैं
अंदर की गहमागहमी का
कुछ देर बाद ही
गूँजने लगती हैं किलकारियाँ
बेसाख्ता ठहाकों से भर जाता है
मकान का खालीपन
सौंधी खुशबू से तरोताजा हो जाती है
निष्प्राण पड़ी रसोई
धीरे-धीरे यह ताजा खबर
छत, दीवार, दरवाजे से होकर
पहुँचती है डालियों तक
चौकन्ना रहने की ताकीद देकर
बेफिक्र हो जाता है मकान
वहअपने ‘घर’ होने को नहीं भूलता ।
------------------- ९ दिसम्बर
बदल दो सत्ता के आयाम
सीखो उनसे तटस्थ रहना
सीखो उनसे हर मसले से
अपने को अलग कर लेना
सीखो उनसे निर्लिप्त रहना
सीखो उनसे मौन रहना
मन्द मन्द मुस्कुराना
केवल मुद्राओं से व्यक्त होना
कभी हाथ पकड़ना कभी हाथ छोड़ना
सीखो उनसे लरजना, गरजना
अपनी बात मनवाना
सीखो उनसे युद्ध और प्रेम
दोनों दिमाग से करना
सीखो उनसे
कैसे जीती जाती हैं लड़ाइयाँ
बिना लड़े भी
कैसे झुकाया जाता है किसी को
खुद बिना झुके एक इंच भी
उनसे लड़ो मत डरो मत
तन के खड़ी रहो
आँख में आँख डालकर
इतिहास साक्षी रहा है
सत्ता बदल जाती है रातों रात
एक इतिहास रचो तुम भी
और बदल दो सत्ता के आयाम ।
------------------- २४ दिसम्बर
वर्गीकृत चिन्ता
तुम्हारा दिन शुरू होता है
अखबार से
और मेरा चाय की पतीली से
तुम्हें चिन्ता होती है
अफगानिस्तान में आज क्या हुआ
अमेरिका के राष्ट्रपति ने
भारत के प्रधानमंत्री से क्या कहा
तुम्हें चिन्ता होती है
सीरिया के गृह युद्ध की
या रूस में होने वाले
राष्ट्रपति चुनाव की
चाय बनाते हुए
मैं भी रहती हूँ
तुम्हारी ही तरह चिन्तित
कि गैस कितने दिन चलेगी
नल में आज पानी आएगा या नहीं
सब्जी कौन सी बनाऊँ
या बिजली हो तो कपड़ों का
एक ढेर निपटा दूँ मशीन में
तुम्हारी चिन्तायें बड़ी-बड़ी
और वैश्विक
मेरी चिन्तायें छोटी-छोटी
और उनमें अखिल विश्व समाया हुआ।
------------------- २६ दिसम्बर
कैसे मनाती होगी पृथ्वी नया साल
पृथ्वी को तो पता होगा
वह कब आई अस्तित्व में
और कब डूब जाएगी प्रलय में
कैसा लगता होगा उसे
एक साल बीत जाने पर
थककर चूर हो जाती होगी चल चलकर
या खुश होती होगी
कि पूरा कर ही लिया बिना रुके
एक और चक्कर
या कि माथे का पसीना पौंछती होगी वह
और गिनती होगी
बची हुई उम्र का हिसाब उँगलियों पर
पृथ्वी कब मनाती होगी नया साल
क्रिसमस के बाद
गुड़ी पड़वा पर
पतेति, मुहर्रम, दीपावली पर ?
पृथ्वी इंतज़ार करती होगी क्या
जाड़ों में गुनगुनी धूप का
शरद ऋतू में चांदनी का
आखिर में घूमता होगा क्या उसके सामने
पूरा साल
किसी केलिडोस्कोप-सा ?
उल्का पिंडों के अलग होने का दुख
सालता होगा क्या अंतिम पलों में ?
याद आती होगी क्या कोई
कलकल बहती, सूख गई नदी ?
या बंजर हो गई उपजाऊ जमीन
कितनी बार थरथराई थी वह
भूकम्प आने से पहले
यह सोचकर कांपती होगी क्या वह आखिरी दिन ?
कितना अजीब लगता होगा उसे
आधे हिस्से के साथ
नया साल मनाना
और आधे हिस्से को वहीँ
पुराने साल में थामे रखना
कैसे मनाती होगी आखिर
पृथ्वी अपना नया साल !!!
------------------- २७ दिसम्बर
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