साहित्य अनुपस्थित: सम्मेलन यथावत
यह एक छोटेसे अनौपचारिक, नितांत पारिवारिक समारोह की बात है। उस समारोह में डाक्टर्स, वकील, बैंकर्स, स्वतंत्र व्यवसाय करने वाले व्यवसायी, अधिकारी अर्थात समाज के संभ्रांत कहे जाने वाले वर्ग के मान्यवर एकत्रित थे। हर वर्ग अपने अपने समूहों में विभक्त होकर चर्चारत था। थेाडी देर समारोह, उसकी भव्यता एवं व्यवस्था, आयोजन के स्वामी की विनम्रता, सौजन्य की चर्चा के बाद पारिवारिक समस्याओं का दौर-दौरा चालू हुआ, बच्चों के केरिअर, कोचिंग संस्थानों की लूट,वहाँ प्रवेश में धांधली से चलते चलते चर्चा ओबामा, अन्ना, शरद पवार,चिदम्बरम, कपिल सिब्बल, सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग, जगजीतसिंह, देवानंद,तक पहुँच गई।
महिलाओं के अपने विषय थे, बच्चे, पति, सब्जी के भाव, पार्लर, नवीनतम परिधान , ननद की शादी, देवर के खर्चे,आदि तो अन्य कुछ महिलायें अंत:स्त्राव,रजोनिवृत्ति,सन्तुलित आहार,शारीरिक गतिविधि,व्यायाम इत्यादि पर बात कर रही थीं ।
कुल मिलाकर वहां लगभग सभी विषय थे, एकदम सभी, यहाँ तक कि फेसबुक, ट्विटर, विद्या बालनकी डर्टी पिक्चर तक सब कुछ था, अगर कुछ नही था तो मात्र एक विषय, जो कि अक्सर नही ही होता, वह था साहित्य। साहित्य, साहित्यिक चर्चा सिरे से गायब थी। वहां कुछ साहित्यकार, कवि, लेखक, संपादक भी थे पर उनमें से भी कोई साहित्यिक चर्चा नही कर रहा था। कुछ छपास के मारे सृजनधर्मी जरूर संपादकों की शान में कसीदे काढ़ रहे थे, वर्ना साहित्य अनुपस्थित ही था।
अधिकतर कार्यक्रमों में ऐसा ही देखा गया है। जिस समारोह की बात यहां की गई है, वहाँ सम्भव है कि साहित्य पर चर्चा समयानुकूल ना लगी हो, पर ठेठ साहित्यिक कार्यक्रमों में भी साहित्य पर चर्चा होते मैने तो नही सुनी-देखी। वहां साहित्यकारों पर चर्चा होती है या बहुत हुआ तो रचना वाचन के समय मात्र उसी रचना पर थोडा बहुत कुछ बोल दिया जाता है परंतु समग्रता में साहित्य अक्सर नदारद ही होता है। आज प्रत्येक साहित्यिक कार्यक्रम में भी मुख्य अतिथि ही प्रमुख वक्ता होते हैं, ऐसे ऐसे व्यक्ति प्रमुख वक्ता के रूप में बुलाये जाते हैं जिनका साहित्य से दूर दूर का भी नाता नही होता। ये प्रमुख वक्ता हड़बड़ाहट में आते हैं और गड़बड़ी फैला कर चले जाते हैं। उनके जाते ही कार्यक्रम स्थल पर गिने-चुने श्रोता ही रह जाते हैं, वे भी शेष समय में मुख्य अतिथि को लेकर ही चर्चा करते रहते हैं। चाय-पानी होता है और कार्यक्रम समाप्त हो जाता है। कुल मिला कर साहित्य से इतना ही हमारा सम्बन्ध बचा हुआ है। आजकल क्या नया लिखा जा रहा है या कौनसी नई पुस्तक आई है इस बारे में चर्चा तो लगभग बंद ही हो गयी है। नये रचनाकारों के बारे में जानने की परंपरा भीे प्रायः समाप्त-सी ही है। साहित्यिक कार्यक्रमों में भी नये रचनाकार किसी कोने में गुमसुम - से अपराधी चेहरा लिये खड़े नजर आते हैं। उनको देखकर हल्की-सी मुस्कान तक किसी स्थापित चेहरे पर नजर नही आती।
मुझे लगता है इस दुरावस्था के लिये हमारी सामाजिक और मानसिक संरचना बहुत हद तक जिम्मेदार है। एक तो प्रायः हमें, हम सभी को जिसमें स्वयं लेखक कवि भी शामिल हैं, यह लगता है कि अगर हमने किसी रचनाधर्मी को ज्यादा भाव दिया तो वह स्वयं की रचना सुनाने लग जायेगा, खास कर कवि वर्ग के लिये तो यह आम गलतफहमी है, इस बारे में कुछ चुटकुले आदि भी स्वयं लेखक-कवि सुनाने से बाज नही आते । दूसरा कारण समझ में आता है रचनाधर्मियों की आर्थिक स्थिति, इस आर्थिक विपन्नता के चलते धनी व्यक्ति की ओर हमारा स्वाभाविक रूझान हो जाता है। इस कारण हर कार्यक्रम में धनी एवं रुतबेवाले व्यक्ति के आसपास स्वयं रचनाकार मंडराने लगतेे हैं, अब उस व्यक्ति से किसी साहित्यक चर्चा की अपेक्षा तो हो नही सकती, परिणामतः व्यर्थ की बातों पर चर्चा होती रहती है।
हमारी यह सोच भी साहित्य को हमसे दूर कर करती है कि रचनाकर्म एक फुरसत का कर्म है। मुख्य कार्य तो नौकरी-धंधा करना है। पेट की आग बुझाने का कर्तव्य पूरा होने के बाद साहित्य सृजन हो पाता है। यह आम सोच ही साहित्य को हमसे दूर करने का कार्य करवाती है। इसके अलावा यदि कुछेक अपवाद छोड़ दें तो हिन्दी में साहित्य सृजन, रोटी-रोजी की व्यवस्था नही कर पाता अतः चाहकर भी लेखक, कवि पूर्णकालिक साहित्य सृजन नही कर सकता।
इस पृष्ठभूमि पर विचार करें तो लगता है कि क्या साहित्य सृजन हमेशा मात्र स्वांतःसुखाय ही रहता है ? साहित्य सृजन का वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नही ? अगर यही सत्य है तो सालो-साल आयोजित होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों का औचित्य क्या है ? इन कार्यक्रमों में उपस्थित रहे हजारों लोग क्या हैं ? क्या वे मात्र दर्शक हैं ? या वह भी एक मात्र स्टेटस सिंबल ? वे जा रहे हैं इसलिये मुझे भी जाना है, आप अमुक एक कार्यक्रम में नही दिखे, ऐसा प्रश्न कल को कोई कर दे तो ? मजेदार बात तो यह है कि आप कार्यक्रम में नही थे ऐसा कोई नही पूछता, अक्सर पूछा जाता है आप कार्यक्रम में नही दिखे, तो क्या यह सब दिखावा मात्र है ? मात्र प्रदर्शन ? एक और अहम प्रश्न, क्या साहित्यिक कार्यक्रमों में सुविख्यात,चर्चित अध्यक्ष या मुख्य अतिथि होना नितांत जरूरी है ?सुविख्यात,चर्चित साहित्यकार विभिन्न सभा-सम्मेलनों में हिस्सा लेते हैं, मानो वे साहित्यिक नही, ग्लैमर की दुनिया के बाशिंदे हैं। इनमें से कितने ऐसे हैं जो घूमने-फिरने, मिलने-जुलने से आगे साहित्यिक सृजन को बढावा देते नजर आते हैं ? किसके प्रोत्साहन से कितने नये साहित्यकार पहचाने गये या कितनों का साहित्य प्रकाशित हुआ इसका अध्ययन कभी हुआ है ? अगर बाकायदा अध्ययन हो तो हमारी बहुत सारी गलत फहमियाँ दूर हो जायेंगी।
इस सारी उठा पटक को देखकर लगने लगा है कि साहित्य का भी राजनीतिकरण हो गया है। जैसे राजनीति हमारे जीवन में होते हुये भी जीवन की सांझ-दोपहर से उसका कोई वास्ता नही वैसे ही शायद साहित्य भी जीवन के उतार-चढाव से बहुत दूर होगया है ।
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