दो हजार इक्कीस








जाति नहीं जाती 

पहले लगा 
कि वे दक्षिण भारतीय हैं
फिर कभी सोच बदल गयी
और उनका पहनावा, बोलचाल
स्वभाव, विचार 
ठेठ बंगाली से लगे

कुछ दिन हुए 
पता चला 
कि वे उत्तर भारतीय हैं 
धीरे-से जाति भी आ धमकी 

अब उनका पहनावा, बोलचाल
स्वभाव, विचार में 
मैं उनकी कथित जाति ढूँढती रहती हूँ।
--- ---------------- ११ जनवरी 

घरों में बढ़ गया है ध्वनि प्रदूषण !

घरों में मशीनें 
सुबह से ही आवाज़ 
करने लगती हैं 
वे उनके बीच / उनके साथ 
चुपचाप काम करती रहती हैं 

मशीनों को जरूरत होती है 
देखभाल की 
उनकी देखभाल 
यह एक असम्भाव्य विचार है 
अभी तक 

मशीनें वही और उतना ही 
काम करती हैं 
जितना वे कर सकती हैं 
उनके लिये मान लिया जाता है 
कि अपनी अपरिमित शक्ति से
कर सकती हैं वे 
कुछ भी और कितना भी 

मशीन अनन्त यातना सह लेगी 
कभी नहीं बनायेगी रोटी 
अपने ही गूंधे आटे से 
कितना भी मारो ठोंको 
कपड़े की मशीन 
नहीं साफ़ करती एक चम्मच भी 

उनके लिये जरूरी है 
वे सुबह बनाये बढ़िया चाय 
और रात को उतने ही करीने से 
लगाये जामन 
दिनभर जुती रहे 
और वक़्त ज़रूरत 
बन जाये एटीएम भी 

घरों में बढ़ गया है ध्वनि प्रदूषण 
मशीनों को चुप नहीं किया जा सकता  
वे  भी गाहे - बगाहे 
बोलने लगी हैं अब !

-------------------- २१ फरवरी

ओह ! दुखद...

ओह ! दुखद...
सुबह भरपेट नाश्ते के साथ
लिखे गये कुछ शब्द

दोपहर हाथ में 
आमरस की कटोरी
और
"तुम्हें/आपको इस तरह नहीं जाना था"

शाम की चाय
"विनम्र श्रद्धांजलि"

रात को नज़रें
ओटीटी के कामुक दृश्यों पर
"ओम शांति !"

सूतक शब्दकोश में बन्द है
शोकसभा सामाजिक माध्यमों पर

दुख तो पहले से ही 
समझदार था

अपने मूल नकलीपन के साथ
वह थामे रहा 
घड़ियाली आँसू
हर भयावह काल में !!! 
-------------------  ११  जून 


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