दो हजार अठारह

अनुक्रमणिका 

१.शर्मिंदा भी,गर्वित भी २. कदमताल ३. ४. ५. ६. ७. ८. ९. १०. 




शर्मिंदा भी, गर्वित भी

मैं उस बिरादरी से हूँ 
जिनके पास बोलने के लिए शब्द हैं
लिखने के लिए कलम है
सोचने के लिए मस्तिष्क है
पर वे चुप हैं 
और मैं शर्मिंदा हूँ !

मैं उस बिरादरी से हूँ 
जहाँ पाप-पुण्य की अवधारणा खून में बहती है
जहाँ स्वर्ग-नर्क के द्वार खोल - खोलकर दिखाए जाते हैं
जहाँ हजारों को  नैतिक-अनैतिकता के पाठ 
बारहों महीने  चिल्ला - चिल्लाकर पढ़ाये जाते हैं
लेकिन वे चुप हैं
और मैं शर्मिंदा हूँ ! 

मैं उस बिरादरी से हूँ 
जहाँ सम्बोधन सम्मानित होते हैं
जहाँ शुचिता का प्रचार जोर-शोर से होता है
आन-बान-शान के लिए खून - खराबा तक हो जाता है 
किन्तु वे चुप हैं
और मैं शर्मिंदा हूँ ! 

मैं उस बिरादरी से हूँ
जिसके पास दिमाग होता ही नहीं है 
और अक्ल घुटनों में होती है
वह बिरादरी आज घुटनों के बल 
याचक की मुद्रा में नहीं है 
 दया की भीख से परे है 

वह बिरादरी 
आज अपनी कमजोर आवाज को बुलंद
करने में जुटी है 
और मैं गर्वित हूँ,अभिभूत हूँ  !!! 
-------------------------- १७ अप्रैल 


 कदमताल 

अब जबकि पैरों ने 
लगभग इंकार कर दिया है 
चलने से 
मैं बिस्तर पर पड़े - पड़े 
आनन्द  लेती हूँ
बारिश का
चिड़ियों की चहचहाहट का 
घरों से आ रही बच्चों की खिलखिलाहट
और  तले जा रहे
व्यंजनों की सुगंध  का 

बारिश में भीगती युवतियाँ
स्मरण कराती हैं 
वैभवशाली इतिहास 
और चिड़चिड़ाते उनके पालक
लौटा लाते हैं 
वर्तमान में 

बादलों की आवाजाही 
याद दिलाती है
शाश्वत सत्य की 
और नन्ही बून्दें 
 नगण्य अस्तित्व की 

किसी पर जोर डालना
स्वभाव में ही नहीं है मेरे 
और असहाय होकर भी 
पैर कितना कुछ दे रहे हैं 

कदम ही तो साक्षात्कार 
कराते हैं जीवन का
उठें तब भी
न उठें तब भी !!!
-------------------- १८ जुलाई

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