दो हजार सोलह

अनुक्रमणिका 

१.वे थीं असली सुपर मॉम २.वे नहीं भूलते  ३.सम्भावना शेष है ! ४.माँ और सिर्फ माँ - (१ ) ५.कभी कभी अच्छे दिन यूँ भी आते हैं  !!!  ६.स्त्री की कीमत ७.संदेह का लाभ ८.पाँच अक्षरों का खेल ९.रंगहीन साड़ी १०.शायद ११.तत्सम ही रहने दो १२.क्योंकि वह आम था ! १३.जिम्मेदार दरवाजा १४.ये आपने क्या किया, सावित्रीबाई !  १५.संभ्रम १६.सिर्फ रंग की वजह से १७.पचास पार का पुरूष  १८.माँ और सिर्फ माँ (२) १९.प्रगतिशील २०. कवयित्री का काव्य पाठ २१. बौद्धिक जुगाली २२. बुरे दिनों की कविता 








वे थीं असली सुपर मॉम

वे जानती थीं पकाने के पहले 
गलाने से दाल हो जाती है सुपाच्य 
वे जानती थीं
पत्तेदार सब्जियों के पोषक तत्व 
बढ़ जाते हैं खटाई डालने से 
वे जानती थीं
अंकुरित दालों का महत्व  
वे जानती थीं बनाये जा सकते हैं 
पौष्टिक थालीपीठ 
अनेक अनाजों को मिलाकर 
और वे जानती थीं 
सत्तू और दही चिवड़ा 
जैसे झटपट बनने वाले भोजन को 

वे जानती थीं
एक मुट्ठी चना या मूंगफली के दानों से 
कैसे होती है बच्चे की बढ़त 

वे जानती थीं
अनाज को संरक्षित करना 
वे जानती थीं 
पुराने कपड़ों से 
नये कपड़े सिलना 
थेगले लगाकर 
फटी गृहस्थी को ढाँपना 

वे जानती थी बुजुर्गों की देखभाल 
और मेहमानों की आवभगत को 

उन्होंने गिना नहीं कभी 
लहसुन की कलियों को 
इंचों में नापा नहीं 
अदरक के टुकड़ों को 
आटा, बेसन, शक्कर, घी 
समाये रहते थे उनकी आँखों में 
कढ़ाई का वजन तय करता था तापमान 
हाँडी में भात, गड़वे में दाल 
बर्तन की गढ़न से बता देती थीं 
वे थाली में होंगे कौन से पकवान 

वे बहुत कुछ जानती थीं 
वे बहुत कुछ समझती थीं
पर कभी कह नहीं पाईं  
धीरे-से हँस ली 
पर अपने को प्रदर्शित नहीं कर पाईं

वे अपने समय की सुपर मॉम थीं 
लेकिन वैसे कभी जतला नहीं पाईं।
------------------ २४ जनवरी


वे नहीं भूलते


कितनी ही बार चलीं  

वे रैंप पर 

कितने ही दिए उन्होंने ऑडिशन 

आधा चम्मच बारीक कटी लहसुन 

और नमक स्वादानुसार का 

अर्थ जाने बिना करती रहीं  

वे कुकरी शो 

लगातार, अनवरत 

तब कहीं हो पाया था उनका चयन 


इस बीच 

एक पूरी की पूरी नदी 

बह गई पुल के नीचे से 


वे नहीं पहना पायीं 

अपनी मनपसंद कमीज 

भूल गयीं अपना पसंदीदा भोजन 


लेकिन चयनकर्ताओं की 

स्मृति बहुत तेज है 

वे नहीं भूलते 

झिड़कना यदा-कदा 

सब्जी और साड़ी को लेकर 

------------------- १६ फरवरी

सम्भावना शेष है !


जब भी सम्भव हुआ 
बताया स्त्री को 
अस्मिता के साथ 
जीने का महत्त्व 

जब भी सम्भव हुआ 
एक प्याला चाय भी 
ना बना सकने वाले 
पुरुष को सिखाये 
रसोई के आसान नुस्खे 

जब भी सम्भव हुआ 
राह चलते भी 
समझाईश दी 
सिगरेट पीते किसी युवा को 

जब भी सम्भव हुआ 
पैसे बचाये 
लम्बा-लम्बा पैदल चलकर 

जब भी सम्भव  हुआ 
दुनिया को देखा 
चष्मा उतारकर 

लेकिन अब 
जबकि 
कोई कुछ सुनना ही नहीं चाहता 
समझाईश का कोई असर 
किसी पर नहीं पड़ता 
सीखने की भी वैसी ललक 
नहीं बची है अब किसी में 
पैसा बचाना कंजूसी का 
पर्याय बन गया है 
और आँखों पर 
काँच चढ़ाये बिना एक कदम भी 
चलना मुश्किल हो गया है 
किसी के लिये भी 

तब बिना किसी प्रत्याशा के 
कुछ घटित होने की प्रतीक्षा है 
जिसे देखा जा सके 
किसी चष्मे के बिना
अनुभव किया जा सके 
बिना सांसों के 
और जो बचा रहे बाद में भी। 
-------------------- २८ फरवरी 


माँ और सिर्फ माँ - १ 

एक चुन्नी के लिए 
पूरी अलमारी उलट -पुलट हो गई 
और माँ याद आ गई .

माँ प्लास्टिक की थैलियों को भी 
रखती थी धो-सुखाकर
बड़ी-छोटी, अच्छी-ख़राब 
करीने से तह जमाकर

चम्मच,कटोरी,थाली, भगौने 
सब बंधे रहते थे अनुशासन में 
माँ की सन्दूक में कभी ताला नहीं होता था 
तब भी खोलने से डरते थे हम 

माँ चौकस रहती थी 
कि कहीं कुछ बिखर न जाय 
कि कहीं कुछ खो न जाय 

गृहस्थी तो दूर 
इज्जत भी अपनी सलीके से 
नहीं बचा पा रहे हैं हम . 

माँ ! इन दिनों 
तुम  बेसाख़्ता याद आती हो।
------------------------------- ५ मार्च 

कभी कभी अच्छे दिन यूँ भी आते हैं  !!! 


१. 

पैरों में फटती नहीं है बिवाई

कपड़ों की सीवन उधड़ी हुई नहीं रहती

पेट होता है भरा हुआ

और प्यास भी नहीं सताती

लम्बा लम्बा चलते हुए

घिर आते हैं बादल, धूप नहीं होती

कभी कभी अच्छे दिन यूँ भी आते हैं  !!! 

 

२. 

जब गाडी में सवार होते ही

कोई पूछता है

कहां जाना है

तो  लगता है

कि आज भी वास्ता रखते हैं 

लोग एक दूसरे से

और पूछने वाले को

मिल जाता है

तुरत फुरत जवाब

तो  लगता है

कि अब भी बचा हुआ है

भरोसा एक दूसरे में । 

कभी कभी अच्छे दिन यूँ भी आते हैं  !!!


३. 

सुबह बड़े बच्चों के हाथ में 

मोबाईल की जगह 

गेंद या फ़ुद्दी दिखती है 


शाम को पैदल घूमते 

पहले  बाइक 

फिर एक कार

बिना हॉर्न बजाए

आहिस्ता से गुजर जाती है ...


कभी कभी अच्छे दिन यूँ भी आते हैं  !!!


४. 

सुबह 

बरसों बाद एक मित्र का 

बस यूँ ही 

फोन आता है 



कहीं छपी 

कुछ कविताओं पर 

एक मामूली रकम का चेक 

शाम को 

मिलता है ....


कभी कभी अच्छे दिन यूँ भी आते हैं !!!


५. 

सुबह 

कहीं से भी नहीं आती 

पानी के  पम्प  की आवाज 

दूर कहीं से 

कोयल की कूक

सुनाई देती है 


शाम को 

सौंधी मिट्टी की खुशबू

आती है कहीं से 

चाय अच्छी बन जाती है ....


कभी कभी अच्छे दिन यूँ भी आते हैं !!! 


----------------------------- ७ मार्च

स्त्री की कीमत 

भरी बाल्टी में मग डुबोते हुए 
याद आते हैं आर्कमिडीज  

कोई फल टूटकर गिरता है डाली से 
तो  अनायास चले आते हैं न्यूटन  

मस्तिष्क में बसे हैं जगदीश चंद्र बसु 
आंगन में लगे पेड़-पौधों के साथ 

सूर्य के संग गेलिलियो 
चंद्रमा के संग आर्मस्ट्रांग 
होते हैं अटूट रिश्ते की तरह 

पर अक्सर विस्मृत  
हो जाते हैं राजा राममोहन राय 

जबकि कितनी ही चितायें  
सजी रहती हैं आसपास 

क्या एक मग पानी 
या दस- पाँच रुपए के फल 
जितनी भी नहीं होती एक स्त्री की कीमत ?
------------------------------- ११ मार्च 


संदेह का लाभ

यूँ तो अपराधी कई थे,
पर हमेशा और बड़ी तादाद में 
चींटियाँ ही मारी गईं

वे रात के अँधेरे में चुपचाप 
करते थे हमला 
चींटियाँ घूमती थी 
दिन के उजाले में 
झुण्ड की झुण्ड बेख़ौफ़

अपराध करते हुए देखी गईं चींटियाँ
और सजा उन्हें ही मिली 
बाकी निर्दोष छूट गए 
संदेह का लाभ लेकर....!!!

-------------------- १५ मार्च


पाँच अक्षरों का खेल

दिल और दिमाग 
पाँच अक्षर 
मिले थे हम दोनों को बराबर 
तुम  हमेशा 
चालाकी से करते रहे 
तीन का इस्तेमाल 
अपने लिए 
और दो दे दिए 
जतन से 
मंजूषा में रखकर मेरे लिए 

हारती रही हूँ 
सदा  इसीलिए....
---------------------- २८ मार्च 


रंगहीन साड़ी

माँ अपनी गीली साड़ी को 
कितनी ही बार झटक कर 
रस्सी पर सुखाती थी 
किनारे व पल्लू की सलवटें  निकालकर 
रख देती थी गद्दे के नीचे 
प्रेस के लिए 
साड़ी मुझे तभी से भाती थी 

जब एक बूंद ने अकस्मात धकेल दिया 
मुझे औरतों की जमात में 
और पल्लू की अहमियत समझायी गई बार-बार 
तब भी साड़ी अच्छी लगती रही 

कीमती बनारसी साड़ी पहने 
अपने खूबसूरत प्रतिबिंब को 
ठीक से देखा भी नहीं था 
कि सौंप दिया गया 
कह दिया गया
निहारो अपने आप को उसकी आँखों में 
साड़ी से प्यार तब भी कम नहीं हुआ 

उस प्यारी रुलाई 
और मीठी क्षुधा को 
पल्लू से ढँक  कर 
जब-जब  शांत किया 
तो कितने ही अमृतकण 
छलक आये थे चेहरे पर 
और बिखर गये थे साड़ी पर
मोह के मधु कण 

रंग बिरंगी साड़ियाँ  पहनकर
खूब लजायी खूब शर्मायी
इतरायी भी बहुत सारा  
पर उस दिन चुभ गई 
वह कोमल सूती साड़ी 
जब सारे रंग हटाकर 
थमा दिया गया सफेद रंग. 
-------------------- २ अप्रैल
शायद
बरसो बरस
वह पढ़ती रही
वही अख़बार
जिसे उसके घर के आदमी पसंद करते थे .
वे बड़े चाव से पढ़ते थे
अख़बार का स्तम्भ
'जिद करो दुनिया बदलो'
करती रही बर्दाश्त
उनकी हर जिद को
इस भरोसे से
कि शायद
उनकी जिद से
बदल जाएगी उसकी दुनिया !!!
----------------------------------१२ मई

बरसो बरस

बरसो बरस
वह पढ़ती रही 
वही अख़बार 
जिसे उसके घर के आदमी पसंद करते थे .

वे बड़े चाव से पढ़ते थे 
अख़बार का स्तम्भ 
'जिद करो दुनिया बदलो'

करती रही बर्दाश्त 
उनकी हर जिद को 
इस भरोसे से 
कि शायद 
उनकी जिद से 
बदल जाएगी उसकी दुनिया !!!
------------------------- १४ मई 

तत्सम ही रहने दो

मत करो वर्णमाला में शामिल
किसी संधि में जगह मत दो
समास में रहने दो अपने पीछे
मंजूर है.

एक बिनती है
तत्सम ही रहने दो
अपभ्रंश मत बनाओ .

मुश्किल हो जाता है
अपभ्रंश की जड़ें ढूँढना !!!
--------------------------- २६ मई

क्योंकि वह आम था !

कभी भारी-भरकम तरबूज ने 
उसे पीछे धकेल दिया 
कभी छुईमुई नाजुक - सी 
आइसक्रीम से वह पिछड़ गया 

बाहर वाले 
कभी समझ ही नहीं पाये 
कि केसरिया रसीला आम 
अन्दर ही अन्दर कब गल गया 
कैसे सड़ गया ?
-------------------- ८ जून

जिम्मेदार दरवाजा 

दरवाजा बंद हो 
तो कुछ भी पता नहीं चलता 
कि अंदर कोई गुस्से में उबल रहा है 
या शांत बैठा किसी किताब को पढ़ रहा है 
मुदित,आनंदित अपने को निहार रहा है 
या भीतर ही भीतर रो रहा है 

दरवाजा खुला हो 
तो उसके पीछे छिपी रहती हैं 
कई चीजें झाड़ू, झाड़न, सूपड़ी 
या फिर टंगे रहते हैं मैले कपड़े 
कहीं कुछ बंद करने के लिए 
एकाध ताला भी अटका रहता है 

दरवाजा बहुत जिम्मेदार होता है 
बंद हो या खुला 
घर को कितना सारा बचाए रखता है ।
-------------------- १८ जून

ये आपने क्या किया, सावित्रीबाई ! 

सावित्रीबाई ! 
ये आपने क्या किया 

मुझे सिखाया 
अ अक्ल का 
अ अस्तित्व का 
अ अस्मिता का 
क कमाई का 
ल लड़ने का 

मैं कैद थी अंधेरे कोनों में 
सावित्रीबाई आपने  निकाला 
मुझे बाहर 

पर वे जो खुश थे 
अपने ही आलोकित घेरों में 
वे अब भी वही हैं 
और मेरे पाँव ठिठक गये हैं 
अँधेरे और उजाले के बीच
अशांत हूँ 
आपने मुझे शिक्षित क्यों किया 
सावित्रीबाई !!!
--------------------- ८ अक्टूबर
 
संभ्रम 

ऊपर के खाने में रखी मिर्च 
अपना हरा रंग छोड़कर 
पीले और लाल के बीच थी 
तभी अकस्मात 
वह नीचे के खाने में आ गिरी 

सोचा शायद कोई बड़ी इल्ली है 
और उसे हटाने की जुगत में जुट गई 

सूख रही मिर्च को इल्ली समझना 
सांप्रदायिकता कहलायेगी या असहिष्णुता ? 
------------------- १७ अक्टूबर


सिर्फ रंग की वजह से 

काफी मैले हो गए थे 
इसलिये उन सब को धो दिया 
धुलने के बाद 
कुछ का रंग काफी निखर गया 
कुछ थोड़े फीके पड़ गये 
और कुछ ने पूरी तरह छोड़ दिया 
अपना रंग और बदरंग हो गये 

जो निखर गये थे 
उन्होंने आकर्षित किया सबको 
जिनके रंग फीके पड़ गये थे 
उनकी ओर भी देखा कुछ ने 
लेकिन जो बदरंग हो गये थे 
वे अनदेखे रह गये 

धुलने से किसी की 
गुणवत्ता नहीं बदली थी 
पर सिर्फ रंग की वजह से 
कुछ आगे बढ़ गये 
कुछ पीछे रह गये ।
---------------------- २३ नवम्बर


पचास पार का पुरूष 

पचास पूरे कर चुका पुरूष
पहचान में आ जाता है दूर से ही

वह किसी स्त्री के नजदीक से 
घुमाता है अपनी दो पहिया 
बेधड़क, लेकिन आहिस्ता से

कभी कभी हौले-से मुस्कुराता है 
किसी परिचिता को सामने पाकर 
जिसकी ओर देखने से भी डरता था 
महज पांच साल पहले तक

कंधे तक आ गई बेटी के साथ 
चलता है वह चौकन्ना होकर 
नहीं निकलता अब वह 
घर से लाल टी शर्ट पहनकर

सब्जी भाजी के झोले के साथ
ख़ुशी ख़ुशी निभाता है जिम्मेदारी 
चेहरा दमकता है उसका आत्मविश्वास से 
निर्भीक होकर अब वह 
महिला सहकर्मी का परिचय करवाता है 
साथ चल रही पत्नी से

दो कदम भी पीछे रह जाय संगिनी 
तो पता चल जाता है उसे, रुकता है 
कभी कभी अकेले में थर्रा जाता है
साथ छूट जाने के डर से

एक कमज़र्फ-सा लड़का 
बदल जाता है धीरे धीरे
गम्भीर, संवेदी परिवार पुरूष में
उससे कोई नहीं पूछता उसकी आयु, उसका अनुभव 
कहीं कोई बात नहीं चलती 
उसके हार्मोनल अंत:स्त्राव की 
पचास पार का पुरूष 
पहचान में आ जाता है 
वैसे ही ...
दूर से ही …
------------------------------- २ जून 



माँ और सिर्फ माँ - २ 

मैं जब कोई आवाज उठाती हूँ 
तो मार्क्स के पीछे चलती हूँ 

 तीज त्यौहार पर पूजा-पाठ करती हूँ 
तो हिंदुत्व की अनुगामी होती हूँ 

 बाजार से  बहुत-सा कुछ उठा लाती हूँ 
तो पूंजीवादी जैसा अनुभव करती हूँ 

 इन सब में जब मेरे बच्चे शामिल होते हैं
तब मैं माँ,माँ और सिर्फ माँ होती हूँ ।
---------------------------------- १० जून 


प्रगतिशील

अब कोई भी मुझसे 
मेरी जाति नहीं पूछता 
मेरे कपड़ों से मेरी औकात का 
अनुमान लगाने की चेष्टा नहीं करता 

बातों बातों में 
वे सिर्फ इतना जानने की कोशिश करते हैं
कि मैं किस संप्रदाय,समुदाय या धर्म की
पक्षधर हूँ. 

लोग अब काफी प्रगतिशील हो गए हैं .
------------------- १६ नवम्बर 


कवयित्री का काव्य पाठ 

कवयित्री के लिए 
आसान नहीं होता 
किसी कवि सम्मेलन  में 
हिस्सेदारी करना 

वह एक समय का खाना बनाकर 
और दो समय का 
इंतजाम कर जाती है 
कविता पाठ के लिए.

बेशक अच्छा लिखती है वह 
पर कवयित्री की बुरी कविता भी 
बटोर लेती है दाद कभी-कभी 

अधिक दाद देने के लिए 
कुछ उससे हाथ मिलाते हैं 
और जब वह उतरती है 
मंच से नीचे 
सेल्फी के बहाने 
सटकर खड़े हो जाते हैं.

कवयित्री घर से निकलकर 
घर पहुँचने तक 
एक बार भी नहीं भूलती 
कि कवयित्री कहलाने के लिए 
कवित्व से ज्यादा जरुरी होता है 
उसके भीतर का  स्त्रीत्व.
-------------------- १८ नवम्बर

बौद्धिक जुगाली

सब्जी छौंकते समय 
राई के पूरी तरह तड़तड़ाने इतना भी 
सब्र नहीं बचा है अब 
समय भी काटने नहीं दौड़ता 
दौड़ते दौड़ते काटने लगता है 

राई तड़तड़ाती है 
उतनी देर में 
क्या कुछ आ जाता है 

इस तेल में अच्छा कोलेस्ट्रॉल है या बुरा 
ज्यादा गरम करने से 
ओमेगा ३ उड़ तो नहीं गया होगा 
सब्जी ऑर्गेनिक ही है 
या फिर वही देसी उठा लाए हैं 
एक आलू डालूँ  क्या 
नींबू निचोड़ूँ  कि नहीं 

इन दिनों पढ़े लिखे होने का 
भरम बढ़ता ही जा रहा है 
और दादी नानी के जमाने से 
छौंकी जा रही 
एक साधारण सब्जी भी 
बौद्धिक जुगाली करने लगी है।
---------------- १८ नवम्बर 


बुरे दिनों की कविता 

बुरे दिन इतने बुरे थे 
कि रुपयों के साथ 
बचाना पड़ते थे कुछ कपड़े 
कुछ अनाज 
और बचाना पड़ती थी 
कुछ भूख भी पेट के लिये 

बुरे दिन इतने बुरे थे 
कि रात गुज़र जाती थी 
करवटें बदलते हुए 
शुक्ल पक्ष में भी 
चांद नज़र नहीं आता था 
तब भी बचा कर रखना पड़ते थे 
कुछ सपने आँखों में 

बुरे दिन इतने बुरे थे 
कि दिन भर मची रहती थी 
चिल्लपों 
बना रहता था चीखना - चिल्लाना 
कराहना और कचोटना 
पर बचाकर रखना पड़ते थे 
कुछ शब्द सहलाने के लिये 

लेकिन बुरे दिनों से 
निकलकर आयी 
अच्छी बात यह थी 
कि भूख से ज्यादा 
कभी कुछ खाया नहीं 
सपने आजीवन बने रहे आँखों में 
और शब्दों को बचा-बचाकर 
आती रही एक कविता
सहलाने के लिये।
------------------- २५ नवम्बर




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